भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

२४२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः । व्यापारे, खिद्यते, यः, तु, निमेषयोः, अपि, तस्य, आलस्यधुरीणस्य, सुखम्, न, अन्यस्य, कस्यचित् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यः=जोआलस्य-धुरीणस्य=आलसी-धुरीण को
निमेषोन्मेषयोः=नेत्र के ढकने और खोलने केअपि=ही
व्यापारे=व्यापार सेसुखम्=सुख है
खिद्यते=खेद को प्राप्त होता हैअन्यस्य=दूसरे
तस्य=उसकस्यचित्=किसी को
न=नहीं है ॥

भावार्थ । व्यापार में अनासक्ति ही सुख का हेतु है । जो ज्ञानवान् जीवन्मुक्त पुरुष हैं, उनको नेत्र के खोलने और बंद करने में भी खेद होता है । जो ऐसा आलसी पुरुष है और सम्पूर्ण व्यापारों से रहित है, वही सुख को प्राप्त होता है । व्यापारवान् को कभी भी सुख नहीं होता है । संसार में पुरुष को जितनी ही व्यवहार विषे अधिक प्रवृत्ति है, उतना ही उसको दुःख अधिक है । और जितना ही व्यवहार-प्रवृत्ति कम है, उतना ही उसको सुख अधिक है । क्योंकि वृत्ति की वृद्धि से दुःख की प्राप्ति, और वृत्ति की निवृत्ति से सुख की प्राप्ति होती है ॥ ४ ॥

मूलम् । इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तं यदा मनः । धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत् ॥ ५ ॥