अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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सोलहवाँ प्रकरण । २४३
पदच्छेदः । इदम्, कृतम्, इदम्, न, इति, द्वन्द्वः, मुक्तम्, यदा, मनः, धर्मार्थकाममोक्षेषु, निरपेक्षम्, तदा, भवेत् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| इदम् = यह | मुक्तम् = मुक्त हो |
| कृतम् = किया गया है | तदा = तब |
| $\left. इदम् न कृतम् \right} =$ यह नहीं किया गया है | सः = वह |
| इति = ऐसे | $\left. धर्मार्थ- काम- मोक्षेषु \right} =$ धर्म, अर्थ, काम और मोक्षविषे |
| द्वन्द्वः = द्वन्द्व से | निरपेक्षम् = इच्छा-रहित |
| यदा मनः = जब मन | भवेत् = होता है ॥ |
भावार्थ । सम्पूर्ण तृष्णा के नाश होने पर शीतोष्णादि-जन्य सुख-दुःख भी पुरुष को नहीं सता सकते हैं, इसी वार्त्ता को अब कहते हैं—
इस काम को मैंने कर लिया है, और इस काम को मैंने नहीं किया है, इस तरह के द्वन्द्वों से जब पुरुष का मन शून्य हो जाता है, तब वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की इच्छा नहीं करता है । ऐसा जो सम्पूर्ण द्वन्द्वों से और सब इच्छाओं से रहित पुरुष है, वहीँ जीवन्मुक्ति के सुख को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
मूलम् । विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः । ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान् ॥ ६ ॥