भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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२४४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

विरक्तः, विषयद्वेष्टा, रागी, विषयलोलुपः, ग्रहमोक्ष- विहीनः, तु, न, विरक्तः, न, रागवान् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ । अन्वयः । शब्दार्थ । विषयद्वेष्टा= { विषय का द्वेषी ग्रह- \ { ग्रहण और विरक्तः=विरक्त है मोक्ष-= { त्याग-रहित विषयलोलुपः= { विषय का लोभी विहीनः / { पुरुष रागी=रागी है न रिक्तः=न विरक्त है न रागवान्= { और न रागवान् है ॥

भावार्थ ।

अब इस वार्ता को कहते हैं कि सकामी पुरुष से निष्काम पुरुष विलक्षण है—

मुमुक्षु होकर जो स्त्री-पुत्रादिक विषयों में द्वेष करता है, अर्थात् द्वेषदृष्टि करके उनको अङ्गीकार नहीं करता है, किन्तु त्याग देता है, उसका नाम विरक्त है । और जो विषयों की कामना करके विषयों में लोलुप चित्तवाला है, उसका नाम रागी है । और जो पुरुष विषयों के ग्रहण और त्याग की इच्छा से रहित है, वह विरक्त सरक्त से विलक्षण अर्थात् ग्रहण-त्याग से रहित जीवन्मुक्त है ॥ ६ ॥

मूलम् ।

हेयोपादेयता तावत्संसारविटपाङ्कुरः । स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम् ॥ ७ ॥