अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 252, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोलहवाँ प्रकरण । २४५
पदच्छेदः ।
हेयोपादेयता, तावत्, संसारविटपाङ्कुरः, स्पृहा, जीवति, यावत्, वै, निर्विचारदशास्पदम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यावत् = | जब तक | जीवति = | जीता है |
| स्पृहा = | तृष्णा | + च = | और |
| यावत् = | जब तक | हेयोपादेयता = | त्याज्य और ग्राह्य भाव |
| निर्विचारदशास्पदम् = | अविवेक दशा की स्थिति है | संसारविटपाङ्कुरः = | संसार-रूपी वृक्ष का अङ्कुर है ॥ |
| तावत् = | तब तक |
भावार्थ ।
विचारशून्यदशा आस्पदीभूत का नाम तृष्णा है अर्थात् जिस काल में कोई विचार न हो, केवल भोगों की इच्छा ही उत्पन्न हो, उसका नाम तृष्णा है । अतः जो तृद्धालु पुरुष है, वह जब तक जीता है, ग्रहण-त्याग करता ही रहता है । संसार-रूपी वृक्ष का अङ्कुर उत्पन्न करनेवाली तृष्णा ही है, सो तृष्णा जीवन्मुक्तों में नहीं रहती है । यदि प्रारब्धकर्म के वश से जीवन्मुक्त में ग्रहण-त्याग का व्यवहार होता भी रहे, तो भी उसकी कोई हानि नहीं है ॥ ७ ॥
मूलम् ।
प्रवृत्तौ जायते रागो निवृत्तौ द्वेष एव हि । निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमानेवमेव व्यवस्थितः ॥ ८ ॥