भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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सोलहवाँ प्रकरण । २४५

पदच्छेदः ।

हेयोपादेयता, तावत्, संसारविटपाङ्कुरः, स्पृहा, जीवति, यावत्, वै, निर्विचारदशास्पदम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यावत् =जब तकजीवति =जीता है
स्पृहा =तृष्णा+ च =और
यावत् =जब तकहेयोपादेयता =त्याज्य और ग्राह्य भाव
निर्विचारदशास्पदम् =अविवेक दशा की स्थिति हैसंसारविटपाङ्कुरः =संसार-रूपी वृक्ष का अङ्कुर है ॥
तावत् =तब तक

भावार्थ ।

विचारशून्यदशा आस्पदीभूत का नाम तृष्णा है अर्थात् जिस काल में कोई विचार न हो, केवल भोगों की इच्छा ही उत्पन्न हो, उसका नाम तृष्णा है । अतः जो तृद्धालु पुरुष है, वह जब तक जीता है, ग्रहण-त्याग करता ही रहता है । संसार-रूपी वृक्ष का अङ्कुर उत्पन्न करनेवाली तृष्णा ही है, सो तृष्णा जीवन्मुक्तों में नहीं रहती है । यदि प्रारब्धकर्म के वश से जीवन्मुक्त में ग्रहण-त्याग का व्यवहार होता भी रहे, तो भी उसकी कोई हानि नहीं है ॥ ७ ॥

मूलम् ।

प्रवृत्तौ जायते रागो निवृत्तौ द्वेष एव हि । निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमानेवमेव व्यवस्थितः ॥ ८ ॥