अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 253, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें२४६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेद: । प्रवृत्तौ, जायते, रागः, निवृत्तौ, द्वेषः एव, हि, निर्द्वन्द्वः, बालवत्, धीमान्, एवम्, एव, व्यवस्थितः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| प्रवृत्तौ = प्रवृत्ति में | निवृत्तौ = निवृत्ति में |
| रागः = राग | द्वेषः = द्वेष |
| च = और | जायते = होता है |
| एव हि = इसलिये | एवम् एव = जैसे होवे, वैसा ही |
| धीमान् = बुद्धिमान् पुरुष | व्यवस्थितः = स्थित रहे ॥ |
| निर्द्वन्द्वः = द्वन्द्व-रहित |
भावार्थ ।
विषयों में जब राग पूर्वक प्रवृत्ति होती है, तब पूर्व से उत्तरोत्तर विषयों में राग ही उत्पन्न होता है। और जब विषयों में द्वेष-पूर्वक निवृत्ति होती है, तब पूर्व से उत्तरोत्तर विषयों में द्वेष-दृष्टि ही उत्पन्न होती है। इसी में एक दृष्टान्त कहते हैं—
"एक राजा दूसरे देश को गया। उसको वहाँ पर कई एक वर्ष बीत गये। पीछे, उसकी रानी अति कामातुर होकर अपने मकान पर से इधर-उधर ताकती थी। एक सराफ का लड़का, युवा अवस्था को प्राप्त, बड़ा सुन्दर अपने कोठे पर खड़ा था। उसको देखकर रानी का मन उसकी तरफ चला गया। रानी ने अपनी लौंड़ी को उसके बुलाने के लिये भेजा। लौंडी उसको बुला लाई। रानी उससे बात चीत करने लगी। थोड़ी देर में लौंडी ने आकर कहा कि राजा साहब आ गये। तब उस लड़के ने कहा कि मुझको कहीं छिपाओ। रानी ने उसको पाखाने के नल में खड़ा कर दिया। इतने में राजा भीतर आ गये और नौकर से कहा, जल्दी पानी