अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 255, कुल 405 में से
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२४८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
हातुम्, इच्छति, संसारम्, रागी, दुःखजिहासया, वीत- राग, हि, निर्दुःख, तस्मिन्, अपि, न, खिद्यति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| रागी = | रागवान् पुरुष | हि = | निश्चय करके |
| दुःखजि-<br>हासया = | दुःख की निवृत्ति की इच्छा से | निर्दुःख = | दुःख से मुक्त होता हुआ |
| तस्मिन् = | संसार विषे | ||
| संसारम् = | संसार को | अपि = | भी |
| हातुम् = | त्यागना | न खिद्यति = | नहीं खेद को प्राप्त होता है |
| इच्छति = | चाहता है | ||
| वीतरागः = | राग-रहित पुरुष |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे शिष्य ! जो पुरुष विषयों में रागवाला है, वही विषय के सम्बन्ध से उत्पन्न हुआ जो दुःख है, उसके त्याग की इच्छा करता हुआ संसार के त्यागने की इच्छा करता है और जो वीतराग पुरुष है, वह संसार के बने रहने पर भी खेद को नहीं प्राप्त होता है, सो पञ्च- दशी में भी कहा है:—
रागो लिंगमबोधस्य चित्तव्यायामभूमिषु ।
कुतो वैशाद्वलस्तस्य यस्याग्निः कोटरे तरोः ॥१॥
जिस वृक्ष के कोटर में याने जड़ के बिल में अग्नि लगी है, उस