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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

२४८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

हातुम्, इच्छति, संसारम्, रागी, दुःखजिहासया, वीत- राग, हि, निर्दुःख, तस्मिन्, अपि, न, खिद्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
रागी =रागवान् पुरुषहि =निश्चय करके
दुःखजि-<br>हासया =दुःख की निवृत्ति की इच्छा सेनिर्दुःख =दुःख से मुक्त होता हुआ
तस्मिन् =संसार विषे
संसारम् =संसार कोअपि =भी
हातुम् =त्यागनान खिद्यति =नहीं खेद को प्राप्त होता है
इच्छति =चाहता है
वीतरागः =राग-रहित पुरुष

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे शिष्य ! जो पुरुष विषयों में रागवाला है, वही विषय के सम्बन्ध से उत्पन्न हुआ जो दुःख है, उसके त्याग की इच्छा करता हुआ संसार के त्यागने की इच्छा करता है और जो वीतराग पुरुष है, वह संसार के बने रहने पर भी खेद को नहीं प्राप्त होता है, सो पञ्च- दशी में भी कहा है:—

रागो लिंगमबोधस्य चित्तव्यायामभूमिषु ।
कुतो वैशाद्वलस्तस्य यस्याग्निः कोटरे तरोः ॥१॥

जिस वृक्ष के कोटर में याने जड़ के बिल में अग्नि लगी है, उस

सोलहवाँ प्रकरण । २४९

वृक्ष को हरियाली याने उसके हरे पत्ते कदापि उत्पन्न नहीं होते हैं । दाष्ट्रान्त में जिस पुरुष के चित्त में अज्ञान का चिह्न बना है, उसको शान्ति कदापि नहीं होती है ॥ ९ ॥

मूलम् । यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा । न च योगी न वा ज्ञानी केवलं दुःखभागसौ ॥ १० ॥

पदच्छेदः । यस्य, अभिमानः, मोक्षे, अपि, देहे, अपि, ममता, तथा, न, च, योगी, न, वा, ज्ञानी, केवलम्, दुःखभाक्, असौ ।

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यस्य=जिसकोअभिमानः=अभिमान है
मोक्षे=मोक्षविषे=न
=औरज्ञानी=ज्ञानी है
देहे=देहविषे=और
अपि=भी=न
तथा=वैसा हीयोगी वा=योगी है
ममता=ममता हैकेवलम्=केवल
असौ=वहदुःखभाक्=दुःख का भागी है ॥

भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि मैं ज्ञानी हूँ, मैं त्रिकालदर्शी हूँ, मैं मुक्त हूँ इस प्रकार का जिसको अभिमान है, वह ज्ञानी नहीं है । जो कहता है मैं योगाभ्यासी हूँ, मैं नित्य ही

२५० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

धोती, नेती, वस्ती आदिक क्रिया करता हूँ, वह भी योगी नहीं है, किन्तु वह केवल दुःख का भोगनेवाला है ॥ १० ॥

मूलम् ।

हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणादृते ॥ ११ ॥

पदच्छेदः ।

हरः, यदि, उपदेष्टा, ते, हरिः, कमलजः, अपि, वा, तथा, अपि, न, तव, स्वास्थ्यम्, सर्वविस्मरणात्, ऋते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदि= अगरतथापि= तो भी
ते= तेरासर्वविस्मरणात् ऋते= बिना सबके विस्मरण के याने त्याग के
उपदेष्टा= उपदेशक
हरः= शिव है
हरि= विष्णु हैतव= तुझको
वा= अथवास्वास्थ्यम्= शान्ति
कमलजः= ब्रह्मा है= नहीं होगी ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! चाहे तुमको महादेव उपदेश करें या विष्णु उपदेश करें या ब्रह्मा उपदेश करें, तुमको सुख कदापि न होगा । जब विषयों का त्याग करोगे, तभी शान्ति और आनन्द को प्राप्त होगे । आत्मतत्त्व के उपदेश के पहिले विषयों का त्याग बहुत जरूरी है ॥११॥

इति श्री अष्टावक्रगीतायां षोडशकं प्रकरणं समाप्तम् ॥१६॥

—:०:—

सत्रहवाँ प्रकरण (ज्ञानी-स्वरूप)

सत्रहवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा ।
तृप्तःस्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकीरमते तु यः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

तेन, ज्ञानफलम्, प्राप्तम्, योगाभ्यासफलम्, तथा, तृप्तः, स्वच्छेन्द्रियः, नित्यम्, एकाकी, रमते, तु, यः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यः=जो पुरुषतेन=उसी करके
नित्यम्=नित्यज्ञानफलम्=ज्ञान का फल
तृप्तः=तृप्त हैतथा=और
स्वच्छेन्द्रियः=शुद्ध इन्द्रियवाला हैयोगाभ्यासफलम्= योगके अभ्यास का फल
=औरप्राप्तम्=पाया गया है ॥
एकाकी=अकेला
रमते=रमता है

भावार्थ ।

अब विंशति श्लोकों करके सत्रहवें प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं। रइतपुरुषों की प्रवृत्ति ब्रह्म-विद्या में कराने के लिये और आत्मज्ञान का फल दिखाने के वास्ते गुरु प्रथम ज्ञान की दशा को दिखाते हैं ।

२५२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

उसी पुरुष को आत्मज्ञान का फल प्राप्त हुआ है और

उसी पुरुष को योगाभ्यास का फल भी प्राप्त हुआ है, जिसने विषयभोगों से रहित होकर अपने आपमें ही तृप्ति पाई है । वही स्वच्छ इन्द्रियोंवाला है अर्थात् उसकी इन्द्रियों में विषयभोग की कामना रञ्चकमात्र नहीं है, जो नित्य अकेला विचरता है और अपने आप स्थित है । दत्तात्रेयजी ने भी कहा है । वासो बहूनां कलहो भवेद्वार्त्ता द्वयोरपि । एकाकी विचरेद्विद्वान् कुमार्या इव कङ्कणः ॥ १ ॥ दत्तात्रेयजी एक ब्राह्मण के घर भिक्षा माँगने गये । घर में एक कुमारी कन्या थी और कोई न था । उस कन्या ने कहा, महाराज ! आप ठहरें, मैं धान कूट और चावल निकालकर आपको देती हूँ । जब वह कन्या धान कूटने लगी तब उसके हाथ में जो काँच की चूड़ियाँ थीं, वे छन्-छन् शब्द करने लगीं । उनके शब्द होने से कन्या को बड़ी लज्जा आई । उसने एक-एक करके उन चूड़ियों को उतार दिया । जब एक ही चूड़ी बाकी रह गई, तब शब्द होना बंद हो गया । तब दत्तात्रेयजी ने विचार करके कहा कि जहाँ बहुत से पुरुषों का एकत्र रहना होता है, वहाँ लड़ाई-झगड़ा जरूर होता है । और जहाँ दो पुरुष इकट्ठे रहते हैं, वहाँ पर गपशप होती है, श्रवण मननादिक नहीं होते हैं । इसवास्ते विद्वान् को चाहिये कि कुमारी कन्या के कङ्कण की तरह अकेला होकर संसार में विचरे । जिस विद्वान् को जीवन्मुक्ति के सुख की लेने की इच्छा होती है,

सत्रहवाँ प्रकरण । २५३

वह अकेला ही रहता है। इसी वास्ते संन्यासी को बहुत पुरुषों के मध्य में रहना और बहुतों को संग रखना भी मना किया है । दक्षस्मृतिः— त्रयी ग्रामः समाख्यात ऊर्ध्वं तु नगरायते । नगरं हि न कर्त्तव्यं ग्रामो वा मैथुनं तथा ॥ १ ॥ एतत्तत्रयं तु कुर्वाणः स्वधर्माच्च्यवते यतिः । राजवार्त्तादि तेषां तु भिक्षावार्त्ता परस्परम् ॥ २ ॥ जहाँ पर तीन भिक्षु मिल करके रहें, उसका नाम ग्राम है । जहाँ पर तीन से अधिक रहें, उसका नाम नगर है । इसवास्ते भिक्षु विद्वान् नगर और ग्राम को न बनावें, और न दूसरे के साथ रहें, किन्तु अकेले ही विचरा करें । जो भिक्षु ग्राम, नगर या मिथुन को करता है अर्थात् दो, तीन और अधिकों के साथ रहता है, वह अपने धर्म से प्रच्युत हो जाता है ॥ १ । २ ॥ सत्कारमानपूजार्थं दण्डकाषायधारणः । स संन्यासी न वक्तव्यः संन्या सी ज्ञानतत्परः ॥ १ ॥ सत्कार, मान और पूजा के अर्थ जो भिक्षु दण्ड और काषायवस्त्रों को धारण करता है, वह संन्यासी नहीं है, जो आत्मज्ञानपरायण होकर अकेला वासना रहित होकर ही रहता है, वही शान्ति को प्राप्त होता है, दूसरा नहीं ॥१॥ मूलम् । न कदाचिज्जगत्यस्मिंस्तत्त्वज्ञो हन्त खिद्यति । यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥ २ ॥

२५४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

न, कदाचित्, जगति, अस्मिन्, तत्त्वज्ञः, हन्त, खिद्यति, यतः, एकेन, तेन, इदम्, पूर्णम्, ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
तत्त्वज्ञः=तत्त्वज्ञानीयतः=क्योंकि
अस्मिन्=इसतेन एकेन=उसी एक से
जगति=जगत विषेइदम्=यह
न कदाचित्=कभी नहींब्रह्माण्डमण्डलम्=ब्रह्माण्ड-मण्डल
खिद्यते=खेद को प्राप्त होतापूर्णम्=पूर्ण है
हन्त=यह बात ठीक है

भावार्थ

हे शिष्य ! इस संसार मण्डल में तत्त्ववित् ज्ञानी कभी भी खेद को प्राप्त नहीं होता है । क्योंकि वह जानता है कि मुझ एक करके ही यह सारा जगत् व्याप्त हो रहा है । खेद दूसरे से होता है, सो दूसरा उसकी दृष्टि में है नहीं ॥ २ ॥

मूलम् ।

न जातु विषयः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी । सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभन्निम्बपल्लवाः ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

न, जातु, विषयः, के, अपि, स्वारामम्, हर्षयन्ति, अभी, सल्लकीपल्लवप्रीतम्, इव, इभम्, निम्बपल्लवाः ॥

सत्रहवाँ प्रकरण । २५५

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अमी=येसल्लकीपल्लवप्रीतम्=सल्लकी के पत्तों से प्रसन्न हुए
के अपि=कोई भी
विषयः=विषयइभम्=हाथी को
न जातु=कभी नहींनिम्बपल्लवाः=नीम के पत्ते
स्वारामम्=स्वात्मारामको
हर्षयन्ति=हर्षित करते हैंन हर्षयन्ति=नहीं हर्षको प्राप्त करते
इव=जैसे

भावार्थ ।

हे शिष्य । जो पुरुष अपने आत्मा में ही रमण करे, उसका नाम आत्माराम है । वह आत्माराम कदापि विषयों की प्राप्ति होने से और उनके भोगने से हर्ष को नहीं प्राप्त होता है । क्योंकि वह विषयों को तुच्छ जानता है । अर्थात् विषय-जन्य सुख को वह मिथ्या जानता है और विषय-भोग भी उस आत्माराम को हर्ष-युक्त नहीं कर सकते हैं । क्योंकि अपनी सत्ता से रहित हैं । जैसे सल्लकी जो मधुर रसवाली बेलि है, उस बेलि के पत्ते जिस हस्ती ने खाए हैं उसको कटु-रसवाले नीम के पत्ते हर्ष को प्राप्त नहीं कर सकते हैं वैसे जिसने आत्मानन्द का अनुभव किया है, उसको विषयानन्द नहीं आनन्दित कर सकता है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासितः ।
अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी तादृशो भवदुर्लभः ॥ ४ ॥

२५६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

यः, तु, भोगेषु, भुक्तेषु, न, भवति, अधिवासितः, अभुक्तेषु, निराकाङ्क्षी, तादृशः, भवदुर्लभः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यः=जो=और
भुक्तेषु=भोगे हुएअभुक्तेषु=अभुक्त पदार्थों विषे
भोगेषु=भोगों मेंनिराकाङ्क्षी=आकांक्षा-रहित है
अधिवासितः=आसक्ततादृशः=ऐसा मनुष्य
न भवति=नहीं होता हैभवदुर्लभः=संसार में दुर्लभ है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जिस पुरुष की भोगे हुए भोगों में आसक्ति नहीं है, और जो नहीं भोगे हुए भोग हैं, उनमें उसकी आकांक्षा भी नहीं है, परन्तु जो अपने आत्मा में ही तृप्त है, वैसा पुरुष संसार-सागर विषे करोड़ों में एक ही है, अथवा एक भी दुर्लभ है ॥ ४ ॥

मूलम् ।

बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते भोगोमोक्षनिराकांक्षी विरलो हि महाशयः ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।

बुभुक्षुः, इह, संसारे, मुमुक्षुः, अपि, दृश्यते, भोगमोक्ष- निराकांक्षी, विरलः, हि, महाशयः ॥

सत्रहवाँ प्रकरण । २५७

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
बुभुक्षः=भोग की इच्छावालाहि=परन्तु
अपि=औरभोगमोक्ष-निराकांक्षी=भोग और मोक्ष की आशा से रहित
मुमुक्षुः=मोक्षकी इच्छावालाविरलः=कोई बिरला ही
इह=इसमहाशयः=महापुरुष है ॥
संसारे=संसार विषे
दृश्यते=देखे जाते हैं

भावार्थ । इस संसार में मुमुक्षु अनेक प्रकार के दिखाई पड़ते हैं, परन्तु जो भोग और मोक्ष दोनों की आकाङ्क्षा से रहित हो और महान् परिपूर्ण ब्रह्म विषे शुद्ध अन्तःकरण से स्थित हो, सो दुर्लभ है ।

गीता में भी भगवान् ने कहा है—
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ १ ॥
हजारों मनुष्यों में से कोई एक मनुष्य अन्तःकरण की शुद्धि के लिये यत्न करता है, फिर उनमें से भी कोई एक विरला पुरुष आत्मा को यथार्थ जानता है ॥ ५ ॥

मूलम् ।
धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा ।
कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता नहि ॥ ६ ॥

पदच्छेदः ।
धर्मार्थ काममोक्षेषु, जीविते, मरणे, तथा, कस्य, अपि, उदारचित्तस्य, हेयोपादेयता, न हि ॥

२५८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
धर्मार्थका- <br> ममोक्षेषु = {धर्म, अर्थ, काम <br> और मोक्ष विषेकस्य=किस
उदारचित्तस्य=उदार चित्त को
जीविते=जीने विषेहेयोपादेयता=त्याग और ग्रहण
तथा=औरनहि=नहीं है ॥
मरणे=मरण विषे

भावार्थ ।

हे शिष्य ! ऐसा पुरुष संसार विषे दुर्लभ है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष और जीने मरने में उदासीन हो अर्थात् उसको सुखाकार दुःखाकार वृत्ति न व्यापे, अपने अद्वैत आत्मा में शान्त होकर स्थित रहे । सुख-दुःख सापेक्षिक है । जिसको सुख होता है, उसी को दुःख भी होता है । जिसको दुःख होता है, उसी को सुख भी होता है । हे प्रिय ! तुम इन दोनों से रहित होकर विचरो ॥ ६ ॥

मूलम् ।

वाञ्छा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ ।
यथा जीविकया तस्माद्धन्य आस्ते यथासुखम् ॥ ७ ॥

पदच्छेदः ।

वाञ्छा, न, विश्वविलये, न, द्वेषः, तस्य, च, स्थितौ, यथा, जीविकया, तस्मात्, धन्य, आस्ते, यथासुखम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
विश्वविलये= {विश्व के लय होने <br> मेंवाञ्छा=इच्छा
न=नहीं है

सत्रहवाँ प्रकरण । २५९

=औरधन्यः=धन्य पुरुष वह है
तस्य=उसकी=जो
स्थितौ=स्थिति मेंयथाजीविकया=यथाप्राप्त आजी- विका द्वारा
द्वेषः=द्वेष
=नहीं हैयथासुखम्=सुखपूर्वक
तस्मात्=इस कारणआस्ते=रहता है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे पुत्र ! विश्व के लय होने की इच्छा जिस विद्वान् को नहीं है, और विश्व के स्थिर रहने में जिसको द्वेष नहीं है, अर्थात् प्रपञ्च रहे अथवा नष्ट हो जाय, और जो अपने को विश्व का साक्षी अधिष्ठान समझकर स्थित है, वही विद्वान् कृतकृत्य है, धन्य है, पूजने योग्य है ॥७॥

मूलम् ।

कृतार्थोऽनेन ज्ञानेत्येवं गलितधीः कृती । पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्तेयथासुखम् ॥ ८ ॥

पदच्छेदः ।

कृतार्थः, अनेन, ज्ञानेन, इति, एवम्, गलितधीः, कृती, पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, आस्ते, यथासुखम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अनेन=इसगलितधीः=गलित हुई है बुद्धि जिसकी, ऐसा
ज्ञानेन=ज्ञान से
कृतार्थ=मैं कृतार्थ हूँकृति=ज्ञानी पुरुष
इति एवम्=इस प्रकारपश्यन्=देखता हुआ

२६० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

शृण्वन्=सुनता हुआअश्नन्=खाता हुआ
स्पृशन्=स्पर्श करता हुआयथासुखम्=सुख-पूर्वक
जिघ्रन्=सूँघता हुआआस्ते=रहता है।

भावार्थ ।

मैं अद्वैत आत्म-ज्ञान द्वारा कृतार्थ हुआ हूँ, ऐसी बुद्धि भी जिस विद्वान् की उत्पन्न नहीं होती है, और आहारादिकों को करता हुआ भी जो शरीर-सुख को उल्लंघन करके स्थित होता है, और बाह्य इन्द्रियों के व्यापारों के होने पर भी अज्ञानी मूर्खों की तरह खेद नहीं करता है, और जो खड़ा हुआ, बैठा हुआ, चलता हुआ भी समाहितचित्तवाला है, वही धन्य है, वही ब्रह्म-रूप है ॥ ८ ॥

मूलम् ।

शून्यादृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च ।
न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे ॥ ९ ॥

पदच्छेदः ।

शून्या, दृष्टिः, वृथा, चेष्टा, विकलानि, इन्द्रियाणि, च, न, स्पृहा, न, विरक्तिः, वा, क्षीणसंसारसागरे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
क्षीणसंसारसागरे =नाश हुआ है संसार- रूपी समुद्र जिसका, ऐसे पुरुष विषेविकलानि=विकल हो गई हैं
न=
दृष्टिःशून्या=दृष्टि शून्य हो गई हैस्पृहा=इच्छा है
चेष्टावृथा=व्यापार जाता रहा हैवा=और
इन्द्रियाणि=इन्द्रियाँन=
विरक्तिः=विरक्तता है ॥

सत्रहवाँ प्रकरण । २६१

भावार्थ ।

हे शिष्य ! जिस पुरुष का संसार-सागर क्षीण हो गया है, उसको विषय-भोगों की इच्छा भी नहीं रहती है, और न उनसे विरक्त होने की इच्छा उसको रहती है । उस विद्वान् का मन और शरीरेन्द्रियादिक बालक या उन्मत्त की तरह अपने व्यापारों से शून्य रहते हैं, और उसके शरीर की चेष्टा भी वृथा ही होती है । उसकी इन्द्रियां भी सब निर्बल होती हैं । आगे स्थित हुए विषयों का निर्णय नहीं कर सकता है । गीता में भी कहा है—

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ १ ॥

सम्पूर्ण भूतों की जो आत्मज्ञान-रूपी रात्रि है, और जिसमें सब भूत सोए हुए हैं, उसमें विद्वान् जागता है । जिस अज्ञान-रूपी दिन में सब भूत जागते हैं, उसमें विद्वान् सोया हुआ रहता है ॥ ९ ॥

मूलम् ।

न जागर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति । अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः ॥ १० ॥

पदच्छेदः ।

न, जागर्ति, न, निद्राति, न, उन्मीलति, न, मीलति, अहो, परदशा, क्व, अपि, वर्तते, मुक्तचेतसः ॥

२६२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
न जागर्ति=न जागता हैअहो=आश्चर्य है कि
न निद्राति=न सोता हैक्वापि=कैसी
न उन्मीलति=न पलक को खोलता हैपरदशा=उत्कृष्ट दशा
=औरमुक्तचेतसा=ज्ञानी की
न मीलति=न पलक को बंद करता हैवर्तते=वर्तती है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! विद्वान् ऐसे दिन विषे जागता नहीं है । क्योंकि जो जागता है, वह नेत्र के पलकों को खोले रहता है । अर्थात् बाह्य विषयों को देखता है, और स्मरण भी करता है । ज्ञानी बाह्य विषयों को न देखता है, और न स्मरण करता है । इस वास्ते वह जागता नहीं है, और ज्ञानवान् सोता भी नहीं है । क्योंकि जो सोता है, वह नेत्रों के पलकों को बंद कर लेता है । और इसी कारण तब वह बाहर के किसी पदार्थ को नहीं देखता है, सो विद्वान् ऐसा नहीं करता है, किन्तु बाहर के सब पदार्थों को ब्रह्म-रूप करके देखता है ।

प्रश्न—ऐसे ज्ञानवान् की कौन दशा होती है ?
उत्तर—अहो, बड़ा आश्चर्य है कि शान्तचित्तवाला कोई ज्ञानी एक अलौकिक उत्कृष्ट तुरीय अवस्था को प्राप्त होता है, उस दशा का वर्णन चर्ममुख से बाहर है ॥ १० ॥

मूलम् ।

सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः ।
समस्तवासनामुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते ॥ ११ ॥

सत्रहवाँ प्रकरण । २६३

पदच्छेदः । सर्वत्र, दृश्यते, स्वस्थः, सर्वत्र, विमलाशयः, समस्त-वासनामुक्तः, मुक्तः, सर्वत्र, राजते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मुक्तः =जीवन्मुक्त ज्ञानीदृश्यते =दिखलाई देता है
सर्वत्र =सब जगहच =और
स्वस्थः =शान्त हुआसर्वत्र =सब जगह
सर्वत्र =सब जगहसमस्तवासनामुक्तः =सब वासनाओं से रहित
विमलाशयः =निर्मल अन्तःकरण-वालाराजते =विराजता है ॥

भावार्थ । अब ज्ञानवान् की अलौकिक दशा को दिखलाते हैं— हे शिष्य ! विद्वान् जीवन्मुक्त सर्वत्र सुख-दुःख में स्वस्थ-चित्त रहता है । अज्ञानी सुख में हर्ष को और दुःख में शोक को प्राप्त होता है । ज्ञानवान् सुख-दुःख और हर्ष-शोक को बराबर जानकर, अपने आत्मानन्द में मग्न रहता है । अज्ञानी मित्र से राग और शत्रु से द्वेष करता है । ज्ञानवान् शत्रु और मित्र में समदृष्टिवाला रहता है । विद्वान् सम्पूर्ण विषय-वासनाओं से रहित होकर जीवन्मुक्त होता हुआ सम्पूर्ण अवस्थाओं में एकरस ज्यों का त्यों प्रकाशमान रहता है ॥ ११ ॥

मूलम् । पश्यञ्शृण्वन् स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन् गृह्णन् वदन् व्रजन् ईहितानीहितैर्मुक्त मुक्त एव महाशयः ॥ १२ ॥

२६४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, गृह्णन्, वदन्, व्रजन्, ईहितानीहितैः, मुक्तः, एव, महाशयः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
पश्यन्=देखता हुआव्रजन्=जाता हुआ
शृण्वन्=सुनता हुआईहिता नीहितैः=राग-द्वेष से
स्पृशन्=स्पर्श करता हुआमुक्तः=छूटा हुआ
जिघ्रन्=सूँघता हुआएव=निश्चय करके ऐसा
अश्नन्=खाता हुआमहाशयः=महात्मा पुरुष
गृह्णन्=ग्रहण करता हुआमुक्तः=ज्ञानी है ॥
वदन्=बोलता हुआ

भावार्थ ।

सर्वत्र देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, ग्रहण करता हुआ, बोलता हुआ और चलता हुआ भी इच्छा-द्वेष से रहित ही होता है। क्योंकि उसका चित्त महान् ब्रह्म विषे स्थित है, और इसी से वह जीवन्मुक्त है ॥ १२ ॥

मूलम् ।

न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति । न ददाति न गृह्णाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः ॥ १३ ॥

पदच्छेदः ।

न, निन्दति, न, च, स्तौति, न, हृष्यति, न, कुप्यति, न, ददाति, न, गृह्णाति, मुक्तः, सर्वत्र, नीरसः ॥

सत्रहवां प्रकरण । २६५

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
न निन्दति=न निन्दा करता हैन ददाति=न देता है
च=औरन गृह्णाति=न लेता है
न स्तौति=न स्तुति करता हैमुक्तः=ज्ञानी
न हृष्यति=न हर्ष को प्राप्त होता हैसर्वत्र=सर्वत्र
न कुप्यति=न क्रोध करता हैनीरसः=रस रहित है ॥

भावार्थ ।

अब जीवन्मुक्त के लक्षण को दिखाते हैं—

जो जीवन्मुक्त है, वह न किसी की निन्दा करता है, और न स्तुति करता है, और न हर्ष करता है, और न कभी काप को प्राप्त होता है, याने जो संसारी पुरुष जीवन्मुक्त को आदर-सम्मान करते हैं, वह उनकी स्तुति नहीं करता है, और जो उसको निरादर करते हैं; उनकी वह निन्दा नहीं करता है, और न वह अति उत्तम खान-पान आदिकों के प्राप्त होने पर हर्ष को प्राप्त होता है, और न घृत-हीन बासी भोजन मिलने से वह शोक करता है, और न किसी से शरीर के निर्वाह के सिवाय अधिक वस्तु के ग्रहण करने की इच्छा करता है, और न किसी से लेकर दूसरे को देता है, और न किसी से किसी को कुछ दिलवाता है, किन्तु सदा वह अपने आपमें मग्न रहता है ।

**प्रश्न–**संसार में तो लोग नग्न रहनेवाले को जीवन्मुक्त कहते हैं, और कोई-कोई भिक्षा माँगकर खानेवाले को जीवन्मुक्त कहते हैं ।

**उत्तर–**संसारी लोग सकामी होते हैं । जो सकामी होते हैं, उनको नहीं मालूम होता है कि कौन ज्ञानी है, और कौन

२६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अज्ञानी है। और उनको सत्य असत्य का विवेक भी नहीं होता है। वे दम्भ में फँसते हैं, जो हठ से वस्त्रों को त्यागकर मान के वास्ते नगे रहते हैं, और शिष्यों के कान फूँकते हैं। एक से द्रव्य लेकर दूसरे को देते हैं, या नाम के वास्ते मठादिकों को बनाते हैं। जीवन्मुक्त कदापि नहीं हो सकते हैं। वे भी चेले की तरह सकामी हैं, उनके चेलों में स्त्री- पुत्रादिकों की कामना भरी है, उनके कल्याण के लिये वे चेले नंगों को गुरु बनाकर उनकी सेवा करते हैं। जिस महात्मा का चित्त विषय-भोग में है, वह अवश्य नरक को प्राप्त होता है। चाहे वह कितना ही नंगा रहे और पाखण्ड करे।

दृष्टान्त—एक महात्मा एक राजा के मन्दिर में बहुत काल तक रहे। एक दिन वे मर गए। उसी दिन राजा भी मर गया।

उस नगर के बाहर जंगल में एक तपस्वी योगी रहते थे। एक आदमी उनके पास बैठा था। तपस्वी कुछ सोच करके हँसने लगे, तब उस आदमी ने पूछा कि महाराज ! विना प्रयोजन आज आप क्यों हँसते हो ? उन्होंने कहा, हम बिना प्रयोजन नहीं हँसते हैं, किन्तु राजा के पास जो महात्मा रहते थे, वे मर गये हैं और राजा भी मर गया है। और राजा स्वर्ग में गया और महात्मा नरक में गये। क्योंकि राजा का मन महात्मा में रहता था इसी वास्ते वह स्वर्ग में गया। उसको वैराग्य बना रहता था और महात्मा का मन राजभोगों में रहता था और वैराग्य से शून्य रहता था, इसी वास्ते वे नरक को गए।

सत्रहवाँ प्रकरण । २६७

दार्ष्टान्त—चाहे कितना ही नंगा रहे, वह कदापि जीवन्मुक्त नहीं हो सकता है । जो वासना से रहित है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १३ ॥

मूलम् ।

सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वा मृत्युं वा समुपस्थितम् ।
अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एवमहाशयः ॥ १४ ॥

पदच्छेदः ।

सानुरागाम्, स्त्रियम्, दृष्टवा, मृत्युम्, वा, समुपस्थितम्, अविह्वलमनाः, स्वस्थः, मुक्तः, एव, महाशयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
सानुरागाम् =प्रीति-युक्तअविह्वलमनाः =व्याकुलता-रहित होता हुआ
स्त्रियम् =स्त्री को+ च =और
वा =औरस्वस्थः =शान्त होता हुआ
समुपस्थितम् =समीप में स्थितमहाशयः =महापुरुष
मृत्युम् =मृत्यु कोएव =निश्चय करके
दृष्टवा =देखकरमुक्तः =ज्ञानी है ॥

भावार्थ ।

अनुराग अर्थात् प्रीति के सहित स्त्री को देख करके जिसका मन कामातुर नहीं होता है, और मृत्यु को समीप स्थित देखकर जिसका मन भय को नहीं प्राप्त होता है, किन्तु अपने आत्मा-नन्द में आनन्द रहता है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १४ ॥

मूलम् ।

सुखे दुःखे नरे नार्यां संपत्सु च विपत्सु च ।
विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः ॥ १५ ॥