अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 264, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ प्रकरण । २५७
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| बुभुक्षः= | भोग की इच्छावाला | हि= | परन्तु |
| अपि= | और | भोगमोक्ष-निराकांक्षी= | भोग और मोक्ष की आशा से रहित |
| मुमुक्षुः= | मोक्षकी इच्छावाला | विरलः= | कोई बिरला ही |
| इह= | इस | महाशयः= | महापुरुष है ॥ |
| संसारे= | संसार विषे | ||
| दृश्यते= | देखे जाते हैं |
भावार्थ । इस संसार में मुमुक्षु अनेक प्रकार के दिखाई पड़ते हैं, परन्तु जो भोग और मोक्ष दोनों की आकाङ्क्षा से रहित हो और महान् परिपूर्ण ब्रह्म विषे शुद्ध अन्तःकरण से स्थित हो, सो दुर्लभ है ।
गीता में भी भगवान् ने कहा है—
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ १ ॥
हजारों मनुष्यों में से कोई एक मनुष्य अन्तःकरण की शुद्धि के लिये यत्न करता है, फिर उनमें से भी कोई एक विरला पुरुष आत्मा को यथार्थ जानता है ॥ ५ ॥
मूलम् ।
धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा ।
कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता नहि ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
धर्मार्थ काममोक्षेषु, जीविते, मरणे, तथा, कस्य, अपि, उदारचित्तस्य, हेयोपादेयता, न हि ॥