भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 263

२५६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

यः, तु, भोगेषु, भुक्तेषु, न, भवति, अधिवासितः, अभुक्तेषु, निराकाङ्क्षी, तादृशः, भवदुर्लभः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यः=जो=और
भुक्तेषु=भोगे हुएअभुक्तेषु=अभुक्त पदार्थों विषे
भोगेषु=भोगों मेंनिराकाङ्क्षी=आकांक्षा-रहित है
अधिवासितः=आसक्ततादृशः=ऐसा मनुष्य
न भवति=नहीं होता हैभवदुर्लभः=संसार में दुर्लभ है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जिस पुरुष की भोगे हुए भोगों में आसक्ति नहीं है, और जो नहीं भोगे हुए भोग हैं, उनमें उसकी आकांक्षा भी नहीं है, परन्तु जो अपने आत्मा में ही तृप्त है, वैसा पुरुष संसार-सागर विषे करोड़ों में एक ही है, अथवा एक भी दुर्लभ है ॥ ४ ॥

मूलम् ।

बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते भोगोमोक्षनिराकांक्षी विरलो हि महाशयः ॥ ५ ॥

पदच्छेदः ।

बुभुक्षुः, इह, संसारे, मुमुक्षुः, अपि, दृश्यते, भोगमोक्ष- निराकांक्षी, विरलः, हि, महाशयः ॥