अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 262, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ प्रकरण । २५५
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अमी=ये | सल्लकीपल्लवप्रीतम्=सल्लकी के पत्तों से प्रसन्न हुए |
| के अपि=कोई भी | |
| विषयः=विषय | इभम्=हाथी को |
| न जातु=कभी नहीं | निम्बपल्लवाः=नीम के पत्ते |
| स्वारामम्=स्वात्मारामको | |
| हर्षयन्ति=हर्षित करते हैं | न हर्षयन्ति=नहीं हर्षको प्राप्त करते |
| इव=जैसे |
भावार्थ ।
हे शिष्य । जो पुरुष अपने आत्मा में ही रमण करे, उसका नाम आत्माराम है । वह आत्माराम कदापि विषयों की प्राप्ति होने से और उनके भोगने से हर्ष को नहीं प्राप्त होता है । क्योंकि वह विषयों को तुच्छ जानता है । अर्थात् विषय-जन्य सुख को वह मिथ्या जानता है और विषय-भोग भी उस आत्माराम को हर्ष-युक्त नहीं कर सकते हैं । क्योंकि अपनी सत्ता से रहित हैं । जैसे सल्लकी जो मधुर रसवाली बेलि है, उस बेलि के पत्ते जिस हस्ती ने खाए हैं उसको कटु-रसवाले नीम के पत्ते हर्ष को प्राप्त नहीं कर सकते हैं वैसे जिसने आत्मानन्द का अनुभव किया है, उसको विषयानन्द नहीं आनन्दित कर सकता है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासितः ।
अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी तादृशो भवदुर्लभः ॥ ४ ॥