अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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२५४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
न, कदाचित्, जगति, अस्मिन्, तत्त्वज्ञः, हन्त, खिद्यति, यतः, एकेन, तेन, इदम्, पूर्णम्, ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| तत्त्वज्ञः= | तत्त्वज्ञानी | यतः= | क्योंकि |
| अस्मिन्= | इस | तेन एकेन= | उसी एक से |
| जगति= | जगत विषे | इदम्= | यह |
| न कदाचित्= | कभी नहीं | ब्रह्माण्डमण्डलम्= | ब्रह्माण्ड-मण्डल |
| खिद्यते= | खेद को प्राप्त होता | पूर्णम्= | पूर्ण है |
| हन्त= | यह बात ठीक है |
भावार्थ
हे शिष्य ! इस संसार मण्डल में तत्त्ववित् ज्ञानी कभी भी खेद को प्राप्त नहीं होता है । क्योंकि वह जानता है कि मुझ एक करके ही यह सारा जगत् व्याप्त हो रहा है । खेद दूसरे से होता है, सो दूसरा उसकी दृष्टि में है नहीं ॥ २ ॥
मूलम् ।
न जातु विषयः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी । सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभन्निम्बपल्लवाः ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
न, जातु, विषयः, के, अपि, स्वारामम्, हर्षयन्ति, अभी, सल्लकीपल्लवप्रीतम्, इव, इभम्, निम्बपल्लवाः ॥