अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
२५४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
न, कदाचित्, जगति, अस्मिन्, तत्त्वज्ञः, हन्त, खिद्यति, यतः, एकेन, तेन, इदम्, पूर्णम्, ब्रह्माण्डमण्डलम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| तत्त्वज्ञः= | तत्त्वज्ञानी | यतः= | क्योंकि |
| अस्मिन्= | इस | तेन एकेन= | उसी एक से |
| जगति= | जगत विषे | इदम्= | यह |
| न कदाचित्= | कभी नहीं | ब्रह्माण्डमण्डलम्= | ब्रह्माण्ड-मण्डल |
| खिद्यते= | खेद को प्राप्त होता | पूर्णम्= | पूर्ण है |
| हन्त= | यह बात ठीक है |
भावार्थ
हे शिष्य ! इस संसार मण्डल में तत्त्ववित् ज्ञानी कभी भी खेद को प्राप्त नहीं होता है । क्योंकि वह जानता है कि मुझ एक करके ही यह सारा जगत् व्याप्त हो रहा है । खेद दूसरे से होता है, सो दूसरा उसकी दृष्टि में है नहीं ॥ २ ॥
मूलम् ।
न जातु विषयः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी । सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभन्निम्बपल्लवाः ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
न, जातु, विषयः, के, अपि, स्वारामम्, हर्षयन्ति, अभी, सल्लकीपल्लवप्रीतम्, इव, इभम्, निम्बपल्लवाः ॥
सत्रहवाँ प्रकरण । २५५
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अमी=ये | सल्लकीपल्लवप्रीतम्=सल्लकी के पत्तों से प्रसन्न हुए |
| के अपि=कोई भी | |
| विषयः=विषय | इभम्=हाथी को |
| न जातु=कभी नहीं | निम्बपल्लवाः=नीम के पत्ते |
| स्वारामम्=स्वात्मारामको | |
| हर्षयन्ति=हर्षित करते हैं | न हर्षयन्ति=नहीं हर्षको प्राप्त करते |
| इव=जैसे |
भावार्थ ।
हे शिष्य । जो पुरुष अपने आत्मा में ही रमण करे, उसका नाम आत्माराम है । वह आत्माराम कदापि विषयों की प्राप्ति होने से और उनके भोगने से हर्ष को नहीं प्राप्त होता है । क्योंकि वह विषयों को तुच्छ जानता है । अर्थात् विषय-जन्य सुख को वह मिथ्या जानता है और विषय-भोग भी उस आत्माराम को हर्ष-युक्त नहीं कर सकते हैं । क्योंकि अपनी सत्ता से रहित हैं । जैसे सल्लकी जो मधुर रसवाली बेलि है, उस बेलि के पत्ते जिस हस्ती ने खाए हैं उसको कटु-रसवाले नीम के पत्ते हर्ष को प्राप्त नहीं कर सकते हैं वैसे जिसने आत्मानन्द का अनुभव किया है, उसको विषयानन्द नहीं आनन्दित कर सकता है ॥ ३ ॥
मूलम् ।
यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासितः ।
अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी तादृशो भवदुर्लभः ॥ ४ ॥
२५६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
यः, तु, भोगेषु, भुक्तेषु, न, भवति, अधिवासितः, अभुक्तेषु, निराकाङ्क्षी, तादृशः, भवदुर्लभः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| यः=जो | च=और |
| भुक्तेषु=भोगे हुए | अभुक्तेषु=अभुक्त पदार्थों विषे |
| भोगेषु=भोगों में | निराकाङ्क्षी=आकांक्षा-रहित है |
| अधिवासितः=आसक्त | तादृशः=ऐसा मनुष्य |
| न भवति=नहीं होता है | भवदुर्लभः=संसार में दुर्लभ है ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जिस पुरुष की भोगे हुए भोगों में आसक्ति नहीं है, और जो नहीं भोगे हुए भोग हैं, उनमें उसकी आकांक्षा भी नहीं है, परन्तु जो अपने आत्मा में ही तृप्त है, वैसा पुरुष संसार-सागर विषे करोड़ों में एक ही है, अथवा एक भी दुर्लभ है ॥ ४ ॥
मूलम् ।
बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते भोगोमोक्षनिराकांक्षी विरलो हि महाशयः ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
बुभुक्षुः, इह, संसारे, मुमुक्षुः, अपि, दृश्यते, भोगमोक्ष- निराकांक्षी, विरलः, हि, महाशयः ॥
सत्रहवाँ प्रकरण । २५७
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| बुभुक्षः= | भोग की इच्छावाला | हि= | परन्तु |
| अपि= | और | भोगमोक्ष-निराकांक्षी= | भोग और मोक्ष की आशा से रहित |
| मुमुक्षुः= | मोक्षकी इच्छावाला | विरलः= | कोई बिरला ही |
| इह= | इस | महाशयः= | महापुरुष है ॥ |
| संसारे= | संसार विषे | ||
| दृश्यते= | देखे जाते हैं |
भावार्थ । इस संसार में मुमुक्षु अनेक प्रकार के दिखाई पड़ते हैं, परन्तु जो भोग और मोक्ष दोनों की आकाङ्क्षा से रहित हो और महान् परिपूर्ण ब्रह्म विषे शुद्ध अन्तःकरण से स्थित हो, सो दुर्लभ है ।
गीता में भी भगवान् ने कहा है—
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ १ ॥
हजारों मनुष्यों में से कोई एक मनुष्य अन्तःकरण की शुद्धि के लिये यत्न करता है, फिर उनमें से भी कोई एक विरला पुरुष आत्मा को यथार्थ जानता है ॥ ५ ॥
मूलम् ।
धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा ।
कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता नहि ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
धर्मार्थ काममोक्षेषु, जीविते, मरणे, तथा, कस्य, अपि, उदारचित्तस्य, हेयोपादेयता, न हि ॥
२५८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| धर्मार्थका- <br> ममोक्षेषु = { | धर्म, अर्थ, काम <br> और मोक्ष विषे | कस्य= | किस |
| उदारचित्तस्य= | उदार चित्त को | ||
| जीविते= | जीने विषे | हेयोपादेयता= | त्याग और ग्रहण |
| तथा= | और | नहि= | नहीं है ॥ |
| मरणे= | मरण विषे |
भावार्थ ।
हे शिष्य ! ऐसा पुरुष संसार विषे दुर्लभ है, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष और जीने मरने में उदासीन हो अर्थात् उसको सुखाकार दुःखाकार वृत्ति न व्यापे, अपने अद्वैत आत्मा में शान्त होकर स्थित रहे । सुख-दुःख सापेक्षिक है । जिसको सुख होता है, उसी को दुःख भी होता है । जिसको दुःख होता है, उसी को सुख भी होता है । हे प्रिय ! तुम इन दोनों से रहित होकर विचरो ॥ ६ ॥
मूलम् ।
वाञ्छा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ ।
यथा जीविकया तस्माद्धन्य आस्ते यथासुखम् ॥ ७ ॥
पदच्छेदः ।
वाञ्छा, न, विश्वविलये, न, द्वेषः, तस्य, च, स्थितौ, यथा, जीविकया, तस्मात्, धन्य, आस्ते, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| विश्वविलये= { | विश्व के लय होने <br> में | वाञ्छा= | इच्छा |
| न= | नहीं है |
सत्रहवाँ प्रकरण । २५९
| च=और | धन्यः=धन्य पुरुष वह है |
| तस्य=उसकी | च=जो |
| स्थितौ=स्थिति में | यथाजीविकया=यथाप्राप्त आजी- विका द्वारा |
| द्वेषः=द्वेष | |
| न=नहीं है | यथासुखम्=सुखपूर्वक |
| तस्मात्=इस कारण | आस्ते=रहता है ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे पुत्र ! विश्व के लय होने की इच्छा जिस विद्वान् को नहीं है, और विश्व के स्थिर रहने में जिसको द्वेष नहीं है, अर्थात् प्रपञ्च रहे अथवा नष्ट हो जाय, और जो अपने को विश्व का साक्षी अधिष्ठान समझकर स्थित है, वही विद्वान् कृतकृत्य है, धन्य है, पूजने योग्य है ॥७॥
मूलम् ।
कृतार्थोऽनेन ज्ञानेत्येवं गलितधीः कृती । पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्तेयथासुखम् ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
कृतार्थः, अनेन, ज्ञानेन, इति, एवम्, गलितधीः, कृती, पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, आस्ते, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अनेन=इस | गलितधीः=गलित हुई है बुद्धि जिसकी, ऐसा |
| ज्ञानेन=ज्ञान से | |
| कृतार्थ=मैं कृतार्थ हूँ | कृति=ज्ञानी पुरुष |
| इति एवम्=इस प्रकार | पश्यन्=देखता हुआ |
२६० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| शृण्वन्=सुनता हुआ | अश्नन्=खाता हुआ |
| स्पृशन्=स्पर्श करता हुआ | यथासुखम्=सुख-पूर्वक |
| जिघ्रन्=सूँघता हुआ | आस्ते=रहता है। |
भावार्थ ।
मैं अद्वैत आत्म-ज्ञान द्वारा कृतार्थ हुआ हूँ, ऐसी बुद्धि भी जिस विद्वान् की उत्पन्न नहीं होती है, और आहारादिकों को करता हुआ भी जो शरीर-सुख को उल्लंघन करके स्थित होता है, और बाह्य इन्द्रियों के व्यापारों के होने पर भी अज्ञानी मूर्खों की तरह खेद नहीं करता है, और जो खड़ा हुआ, बैठा हुआ, चलता हुआ भी समाहितचित्तवाला है, वही धन्य है, वही ब्रह्म-रूप है ॥ ८ ॥
मूलम् ।
शून्यादृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च ।
न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे ॥ ९ ॥
पदच्छेदः ।
शून्या, दृष्टिः, वृथा, चेष्टा, विकलानि, इन्द्रियाणि, च, न, स्पृहा, न, विरक्तिः, वा, क्षीणसंसारसागरे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| क्षीणसंसारसागरे = | नाश हुआ है संसार- रूपी समुद्र जिसका, ऐसे पुरुष विषे | विकलानि= | विकल हो गई हैं |
| न= | न | ||
| दृष्टिःशून्या= | दृष्टि शून्य हो गई है | स्पृहा= | इच्छा है |
| चेष्टावृथा= | व्यापार जाता रहा है | वा= | और |
| इन्द्रियाणि= | इन्द्रियाँ | न= | न |
| विरक्तिः= | विरक्तता है ॥ |
सत्रहवाँ प्रकरण । २६१
भावार्थ ।
हे शिष्य ! जिस पुरुष का संसार-सागर क्षीण हो गया है, उसको विषय-भोगों की इच्छा भी नहीं रहती है, और न उनसे विरक्त होने की इच्छा उसको रहती है । उस विद्वान् का मन और शरीरेन्द्रियादिक बालक या उन्मत्त की तरह अपने व्यापारों से शून्य रहते हैं, और उसके शरीर की चेष्टा भी वृथा ही होती है । उसकी इन्द्रियां भी सब निर्बल होती हैं । आगे स्थित हुए विषयों का निर्णय नहीं कर सकता है । गीता में भी कहा है—
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी । यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥ १ ॥
सम्पूर्ण भूतों की जो आत्मज्ञान-रूपी रात्रि है, और जिसमें सब भूत सोए हुए हैं, उसमें विद्वान् जागता है । जिस अज्ञान-रूपी दिन में सब भूत जागते हैं, उसमें विद्वान् सोया हुआ रहता है ॥ ९ ॥
मूलम् ।
न जागर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति । अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः ॥ १० ॥
पदच्छेदः ।
न, जागर्ति, न, निद्राति, न, उन्मीलति, न, मीलति, अहो, परदशा, क्व, अपि, वर्तते, मुक्तचेतसः ॥
२६२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| न जागर्ति=न जागता है | अहो=आश्चर्य है कि |
| न निद्राति=न सोता है | क्वापि=कैसी |
| न उन्मीलति=न पलक को खोलता है | परदशा=उत्कृष्ट दशा |
| च=और | मुक्तचेतसा=ज्ञानी की |
| न मीलति=न पलक को बंद करता है | वर्तते=वर्तती है ॥ |
भावार्थ ।
हे शिष्य ! विद्वान् ऐसे दिन विषे जागता नहीं है । क्योंकि जो जागता है, वह नेत्र के पलकों को खोले रहता है । अर्थात् बाह्य विषयों को देखता है, और स्मरण भी करता है । ज्ञानी बाह्य विषयों को न देखता है, और न स्मरण करता है । इस वास्ते वह जागता नहीं है, और ज्ञानवान् सोता भी नहीं है । क्योंकि जो सोता है, वह नेत्रों के पलकों को बंद कर लेता है । और इसी कारण तब वह बाहर के किसी पदार्थ को नहीं देखता है, सो विद्वान् ऐसा नहीं करता है, किन्तु बाहर के सब पदार्थों को ब्रह्म-रूप करके देखता है ।
प्रश्न—ऐसे ज्ञानवान् की कौन दशा होती है ?
उत्तर—अहो, बड़ा आश्चर्य है कि शान्तचित्तवाला कोई ज्ञानी एक अलौकिक उत्कृष्ट तुरीय अवस्था को प्राप्त होता है, उस दशा का वर्णन चर्ममुख से बाहर है ॥ १० ॥
मूलम् ।
सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः ।
समस्तवासनामुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते ॥ ११ ॥
सत्रहवाँ प्रकरण । २६३
पदच्छेदः । सर्वत्र, दृश्यते, स्वस्थः, सर्वत्र, विमलाशयः, समस्त-वासनामुक्तः, मुक्तः, सर्वत्र, राजते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मुक्तः = | जीवन्मुक्त ज्ञानी | दृश्यते = | दिखलाई देता है |
| सर्वत्र = | सब जगह | च = | और |
| स्वस्थः = | शान्त हुआ | सर्वत्र = | सब जगह |
| सर्वत्र = | सब जगह | समस्तवासनामुक्तः = | सब वासनाओं से रहित |
| विमलाशयः = | निर्मल अन्तःकरण-वाला | राजते = | विराजता है ॥ |
भावार्थ । अब ज्ञानवान् की अलौकिक दशा को दिखलाते हैं— हे शिष्य ! विद्वान् जीवन्मुक्त सर्वत्र सुख-दुःख में स्वस्थ-चित्त रहता है । अज्ञानी सुख में हर्ष को और दुःख में शोक को प्राप्त होता है । ज्ञानवान् सुख-दुःख और हर्ष-शोक को बराबर जानकर, अपने आत्मानन्द में मग्न रहता है । अज्ञानी मित्र से राग और शत्रु से द्वेष करता है । ज्ञानवान् शत्रु और मित्र में समदृष्टिवाला रहता है । विद्वान् सम्पूर्ण विषय-वासनाओं से रहित होकर जीवन्मुक्त होता हुआ सम्पूर्ण अवस्थाओं में एकरस ज्यों का त्यों प्रकाशमान रहता है ॥ ११ ॥
मूलम् । पश्यञ्शृण्वन् स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन् गृह्णन् वदन् व्रजन् ईहितानीहितैर्मुक्त मुक्त एव महाशयः ॥ १२ ॥
२६४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, गृह्णन्, वदन्, व्रजन्, ईहितानीहितैः, मुक्तः, एव, महाशयः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| पश्यन्=देखता हुआ | व्रजन्=जाता हुआ |
| शृण्वन्=सुनता हुआ | ईहिता नीहितैः=राग-द्वेष से |
| स्पृशन्=स्पर्श करता हुआ | मुक्तः=छूटा हुआ |
| जिघ्रन्=सूँघता हुआ | एव=निश्चय करके ऐसा |
| अश्नन्=खाता हुआ | महाशयः=महात्मा पुरुष |
| गृह्णन्=ग्रहण करता हुआ | मुक्तः=ज्ञानी है ॥ |
| वदन्=बोलता हुआ |
भावार्थ ।
सर्वत्र देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, ग्रहण करता हुआ, बोलता हुआ और चलता हुआ भी इच्छा-द्वेष से रहित ही होता है। क्योंकि उसका चित्त महान् ब्रह्म विषे स्थित है, और इसी से वह जीवन्मुक्त है ॥ १२ ॥
मूलम् ।
न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति । न ददाति न गृह्णाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः ॥ १३ ॥
पदच्छेदः ।
न, निन्दति, न, च, स्तौति, न, हृष्यति, न, कुप्यति, न, ददाति, न, गृह्णाति, मुक्तः, सर्वत्र, नीरसः ॥
सत्रहवां प्रकरण । २६५
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| न निन्दति= | न निन्दा करता है | न ददाति= | न देता है |
| च= | और | न गृह्णाति= | न लेता है |
| न स्तौति= | न स्तुति करता है | मुक्तः= | ज्ञानी |
| न हृष्यति= | न हर्ष को प्राप्त होता है | सर्वत्र= | सर्वत्र |
| न कुप्यति= | न क्रोध करता है | नीरसः= | रस रहित है ॥ |
भावार्थ ।
अब जीवन्मुक्त के लक्षण को दिखाते हैं—
जो जीवन्मुक्त है, वह न किसी की निन्दा करता है, और न स्तुति करता है, और न हर्ष करता है, और न कभी काप को प्राप्त होता है, याने जो संसारी पुरुष जीवन्मुक्त को आदर-सम्मान करते हैं, वह उनकी स्तुति नहीं करता है, और जो उसको निरादर करते हैं; उनकी वह निन्दा नहीं करता है, और न वह अति उत्तम खान-पान आदिकों के प्राप्त होने पर हर्ष को प्राप्त होता है, और न घृत-हीन बासी भोजन मिलने से वह शोक करता है, और न किसी से शरीर के निर्वाह के सिवाय अधिक वस्तु के ग्रहण करने की इच्छा करता है, और न किसी से लेकर दूसरे को देता है, और न किसी से किसी को कुछ दिलवाता है, किन्तु सदा वह अपने आपमें मग्न रहता है ।
**प्रश्न–**संसार में तो लोग नग्न रहनेवाले को जीवन्मुक्त कहते हैं, और कोई-कोई भिक्षा माँगकर खानेवाले को जीवन्मुक्त कहते हैं ।
**उत्तर–**संसारी लोग सकामी होते हैं । जो सकामी होते हैं, उनको नहीं मालूम होता है कि कौन ज्ञानी है, और कौन
२६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
अज्ञानी है। और उनको सत्य असत्य का विवेक भी नहीं होता है। वे दम्भ में फँसते हैं, जो हठ से वस्त्रों को त्यागकर मान के वास्ते नगे रहते हैं, और शिष्यों के कान फूँकते हैं। एक से द्रव्य लेकर दूसरे को देते हैं, या नाम के वास्ते मठादिकों को बनाते हैं। जीवन्मुक्त कदापि नहीं हो सकते हैं। वे भी चेले की तरह सकामी हैं, उनके चेलों में स्त्री- पुत्रादिकों की कामना भरी है, उनके कल्याण के लिये वे चेले नंगों को गुरु बनाकर उनकी सेवा करते हैं। जिस महात्मा का चित्त विषय-भोग में है, वह अवश्य नरक को प्राप्त होता है। चाहे वह कितना ही नंगा रहे और पाखण्ड करे।
दृष्टान्त—एक महात्मा एक राजा के मन्दिर में बहुत काल तक रहे। एक दिन वे मर गए। उसी दिन राजा भी मर गया।
उस नगर के बाहर जंगल में एक तपस्वी योगी रहते थे। एक आदमी उनके पास बैठा था। तपस्वी कुछ सोच करके हँसने लगे, तब उस आदमी ने पूछा कि महाराज ! विना प्रयोजन आज आप क्यों हँसते हो ? उन्होंने कहा, हम बिना प्रयोजन नहीं हँसते हैं, किन्तु राजा के पास जो महात्मा रहते थे, वे मर गये हैं और राजा भी मर गया है। और राजा स्वर्ग में गया और महात्मा नरक में गये। क्योंकि राजा का मन महात्मा में रहता था इसी वास्ते वह स्वर्ग में गया। उसको वैराग्य बना रहता था और महात्मा का मन राजभोगों में रहता था और वैराग्य से शून्य रहता था, इसी वास्ते वे नरक को गए।
सत्रहवाँ प्रकरण । २६७
दार्ष्टान्त—चाहे कितना ही नंगा रहे, वह कदापि जीवन्मुक्त नहीं हो सकता है । जो वासना से रहित है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १३ ॥
मूलम् ।
सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वा मृत्युं वा समुपस्थितम् ।
अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एवमहाशयः ॥ १४ ॥
पदच्छेदः ।
सानुरागाम्, स्त्रियम्, दृष्टवा, मृत्युम्, वा, समुपस्थितम्, अविह्वलमनाः, स्वस्थः, मुक्तः, एव, महाशयः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| सानुरागाम् = | प्रीति-युक्त | अविह्वलमनाः = | व्याकुलता-रहित होता हुआ |
| स्त्रियम् = | स्त्री को | + च = | और |
| वा = | और | स्वस्थः = | शान्त होता हुआ |
| समुपस्थितम् = | समीप में स्थित | महाशयः = | महापुरुष |
| मृत्युम् = | मृत्यु को | एव = | निश्चय करके |
| दृष्टवा = | देखकर | मुक्तः = | ज्ञानी है ॥ |
भावार्थ ।
अनुराग अर्थात् प्रीति के सहित स्त्री को देख करके जिसका मन कामातुर नहीं होता है, और मृत्यु को समीप स्थित देखकर जिसका मन भय को नहीं प्राप्त होता है, किन्तु अपने आत्मा-नन्द में आनन्द रहता है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १४ ॥
मूलम् ।
सुखे दुःखे नरे नार्यां संपत्सु च विपत्सु च ।
विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः ॥ १५ ॥
२६८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
सुखे, दुःखे, नरे, नार्याम्, सम्पत्सु, च, विपत्सु, च, विशेषः, न, एव, धीरस्य, सर्वत्र, समदर्शिनः ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । सुखे = सुख विषे | विपत्सु = विपत्तियों में दुःखे = दुःख विषे | सर्वत्र = सर्वत्र नरे = नर विषे | समदर्शिनः = समदर्शी नार्याम् = नारी विषे | धीरस्य = ज्ञानी का सम्पत्सु = सम्पत्तियों में | विशेषः = भेद नहीं है ॥
भावार्थ ।
जिसका चित्त सुख-दुःख में सम रहता है, अर्थात् शरीर का अतिसुख होने से जो हर्ष को नहीं प्राप्त होता है, और शरीर को खेद होने से जो शोक को नहीं प्राप्त होता है, और सम्पदा के प्राप्त होने पर जिसको हर्ष नहीं होता है, और विपदा के आने पर जिसको शोक नहीं होता है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १५ ॥
मूलम् ।
न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता । नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे ॥ १६ ॥
पदच्छेदः ।
न, हिंसा, न, एव, कारुण्यम्, न, औद्धत्यम्, न, च, दीनता, न, आश्चर्यम्, न, एव, च, क्षोभः, क्षीणसंसरणे, नरे ॥
सत्रहवाँ प्रकरण । २६९
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| क्षीणसंसरणे = | क्षीण हुआ है संसार जिसका | न औद्धत्यम् = | न अनम्रता है |
| च = | और | ||
| नरे = | मनुष्य विषे | न दीनता = | न दीनता है |
| न हिंसा = | न हिंसा है | न आश्चर्य्यम् = | न आश्चर्य्य है |
| न कारुण्यम् = | न दयालुता है | न क्षोभः = | न क्षोभ है ॥ |
भावार्थ ।
जो वासना-रहित पुरुषों के साथ न द्रोह करता है और न दीन के साथ करुणा करता है, और न शारीरिक सुख के लिय किसी के आगे हाथ बढ़ाता है, और न कभी आश्चर्य को प्राप्त होता है, और न कभी क्षोभ को प्राप्त होता है, वही पुरुष जीवन्मुक्त है ॥ १६ ॥
मूलम् ।
न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः ।
असंसक्तमनाः नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते ॥ १७ ॥
पदच्छेदः ।
न, मुक्तः, विषयद्वेष्टा, न, वा, विषयलोलुपः, असंसक्तमनाः, नित्यम्, प्राप्ताप्राप्तम्, उपाश्नुते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मुक्तः = | जीवन्मुक्त | नित्यम् = | सदा |
| न विषयद्वेष्टा = | न विषय में द्वेष करने वाला | असंसक्तमनाः = | आसक्ति-रहित मन- वाला होता हुआ |
| वा = | और | प्राप्ताप्राप्तम् = | प्राप्त और अप्राप्त वस्तु को |
| न विषयलोलुपः = | न विषयों में लोभी है | उपाश्नुते = | भोगता है ॥ |
२७० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ । जो विषयों के साथ द्वेष नहीं करता है, और जो विषय- लोलुप नहीं है, किन्तु असंसक्त मनवाला है, अर्थात् जिसका मन कहीं आसक्त नहीं है । प्रारब्धवश से जो प्राप्त होता है, उसको भोगता है । जो नहीं प्राप्त होता, उसकी इच्छा नहीं करता है, वही जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ १७ ॥
मूलम् । समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः । शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः ॥ १८ ॥
पदच्छेदः । समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः शून्यचित्तः, न, जानाति, कैवल्यम्, इव, संस्थितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| शून्यचित्तः= | बाहर से शून्य चित्तवाला ज्ञानी | जानाति= | जानता है |
| समाधानासमा-<br>धानहिताहित-<br>विकल्पनाः | समाधान और अस- माधान, हित और अहित की कल्पना को | परन्तु=<br>कैवल्यम्= | परन्तु<br>मोक्ष-रूप |
| इव= | सा | ||
| न= | नहीं | संस्थितः= | स्थित है ॥ |
भावार्थ । जो समाधानता और असमाधानता को अर्थात् हित और अहित की कल्पना को नहीं जानता है, ऐसा शून्य चित्तवाला जो विदेह कैवल्य को प्राप्त हुआ है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १८ ॥
सत्रहवाँ प्रकरण । २७१
मूलम् ।
निर्ममोनिरहङ्कारो न किञ्चिदिति निश्चितः ।
अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥ १९ ॥
पदच्छेदः ।
निर्ममः, निरहङ्कारः, न, किञ्चित्, इति, निश्चितः, अन्तर्गलितसर्वाशः, कुर्वन्, अपि, न, लिप्यते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अन्तर्गलितसर्वाशः = | अभ्यन्तर में गलित हो गई है सब आशाएँ जिसकी, ऐसा पुरुष | न किञ्चित् = | कुछ भी नहीं है |
| इति = | ऐसा | ||
| निश्चितः = | निश्चय करता | ||
| निर्ममः = | ममता-रहित है | कुर्वन् = | कर्म करता हुआ भी |
| निरहङ्कारः = | अहङ्कार-रहित है | न लिप्यते = | लिपायमान नहीं होता है |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो विद्वान् 'अहं' मम अभिमान् से शून्य है, अर्थात् 'यह मैं हूँ' और 'यह मेरा है', इस प्रकार के अभिमान से भी जो रहित है, और अधिष्ठानचेतन से अतिरिक्त किंचित् भी सत्य नहीं है, ऐसे निश्चयवाला जो पुरुष है, वह सर्व व्यवहारों को करता हुआ भी कुछ नहीं करता है । क्योंकि उसको कर्तृत्व अभिमान नहीं है ॥ १९ ॥
२७२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् ।
मनःप्रकाशसंमोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः ।
दशां कामपि संप्राप्तो भवेद्गलितमानसः ॥ २० ॥
पदच्छेदः ।
मनःप्रकाशसंमोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः, दशाम्, काम, अपि, संप्राप्तः, भवेत्, गलितमानसः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| गलित-मानसः | गलित हुआ है मन जिसका, ऐसा ज्ञानी | अपि | भी |
| मनःप्रकाश-संमोहस्वप्न-जाड्यविवर्जितः | मन के प्रकाश से चित्त की शान्ति से स्वप्न और जड़ता अर्थात् सुषुप्ति से वर्जित होता हुआ | काम् | किस अनिर्वचनीय |
| दशाम् | दशा की | ||
| संप्राप्तः | प्राप्त | ||
| भवेत् | होता है ॥ |
भावार्थ ।
हे शिष्य ! गलित हो गई है अन्तःकरण की वृत्ति जिसकी, अर्थात् जिस विद्वान् के मन के सङ्कल्प विकल्पादिक नहीं फुरते हैं, और दूर हो गया है स्त्री-पुत्रादिकों से मोह जिसका, अन्तरात्मा की तरफ है चित्त का प्रवाह जिसका, और जो जड़ता से रहित है, अपने आत्मानन्द में सदैव ही स्थित है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है ॥ २० ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां सप्तदशकं प्रकरणं समाप्तम् ॥ १७ ॥
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अठारहवाँ प्रकरण (उपशम / जीवनमुक्ति)
अठारहवाँ प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
यस्य बोधोदये तावत्स्वप्नवद्भवति भ्रमः ।
तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
यस्य, बोधोदये, तावत्, स्वप्नवत्, भवति, भ्रमः, तस्मै, सुखैकरूपाय, नमः, शान्ताय, तेजसे ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यस्य बोधोदये = | जिसके बोध के उदय होने पर | तस्मै = | उस |
| सुखैकरूपाय = | आनन्द-रूप | ||
| तावत् = | पहले | शान्ताय = | शान्त-रूप |
| भ्रमः = | भ्रान्ति | च = | और |
| स्वप्नवत् = | स्वप्न के समान | तेजसे = | तेजमय रूप को |
| भवति = | होती है | नमः = | नमस्कार है ॥ |
भावार्थ ।
अब अठाहरवें प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं—
इस प्रकरण में शान्ति की प्रधानता को दिखलाते हुए