अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 271, कुल 405 में से
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२६४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, गृह्णन्, वदन्, व्रजन्, ईहितानीहितैः, मुक्तः, एव, महाशयः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| पश्यन्=देखता हुआ | व्रजन्=जाता हुआ |
| शृण्वन्=सुनता हुआ | ईहिता नीहितैः=राग-द्वेष से |
| स्पृशन्=स्पर्श करता हुआ | मुक्तः=छूटा हुआ |
| जिघ्रन्=सूँघता हुआ | एव=निश्चय करके ऐसा |
| अश्नन्=खाता हुआ | महाशयः=महात्मा पुरुष |
| गृह्णन्=ग्रहण करता हुआ | मुक्तः=ज्ञानी है ॥ |
| वदन्=बोलता हुआ |
भावार्थ ।
सर्वत्र देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूंघता हुआ, खाता हुआ, ग्रहण करता हुआ, बोलता हुआ और चलता हुआ भी इच्छा-द्वेष से रहित ही होता है। क्योंकि उसका चित्त महान् ब्रह्म विषे स्थित है, और इसी से वह जीवन्मुक्त है ॥ १२ ॥
मूलम् ।
न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति । न ददाति न गृह्णाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः ॥ १३ ॥
पदच्छेदः ।
न, निन्दति, न, च, स्तौति, न, हृष्यति, न, कुप्यति, न, ददाति, न, गृह्णाति, मुक्तः, सर्वत्र, नीरसः ॥