अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 270, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवाँ प्रकरण । २६३
पदच्छेदः । सर्वत्र, दृश्यते, स्वस्थः, सर्वत्र, विमलाशयः, समस्त-वासनामुक्तः, मुक्तः, सर्वत्र, राजते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मुक्तः = | जीवन्मुक्त ज्ञानी | दृश्यते = | दिखलाई देता है |
| सर्वत्र = | सब जगह | च = | और |
| स्वस्थः = | शान्त हुआ | सर्वत्र = | सब जगह |
| सर्वत्र = | सब जगह | समस्तवासनामुक्तः = | सब वासनाओं से रहित |
| विमलाशयः = | निर्मल अन्तःकरण-वाला | राजते = | विराजता है ॥ |
भावार्थ । अब ज्ञानवान् की अलौकिक दशा को दिखलाते हैं— हे शिष्य ! विद्वान् जीवन्मुक्त सर्वत्र सुख-दुःख में स्वस्थ-चित्त रहता है । अज्ञानी सुख में हर्ष को और दुःख में शोक को प्राप्त होता है । ज्ञानवान् सुख-दुःख और हर्ष-शोक को बराबर जानकर, अपने आत्मानन्द में मग्न रहता है । अज्ञानी मित्र से राग और शत्रु से द्वेष करता है । ज्ञानवान् शत्रु और मित्र में समदृष्टिवाला रहता है । विद्वान् सम्पूर्ण विषय-वासनाओं से रहित होकर जीवन्मुक्त होता हुआ सम्पूर्ण अवस्थाओं में एकरस ज्यों का त्यों प्रकाशमान रहता है ॥ ११ ॥
मूलम् । पश्यञ्शृण्वन् स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन् गृह्णन् वदन् व्रजन् ईहितानीहितैर्मुक्त मुक्त एव महाशयः ॥ १२ ॥