अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्रहवां प्रकरण । २६५
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| न निन्दति= | न निन्दा करता है | न ददाति= | न देता है |
| च= | और | न गृह्णाति= | न लेता है |
| न स्तौति= | न स्तुति करता है | मुक्तः= | ज्ञानी |
| न हृष्यति= | न हर्ष को प्राप्त होता है | सर्वत्र= | सर्वत्र |
| न कुप्यति= | न क्रोध करता है | नीरसः= | रस रहित है ॥ |
भावार्थ ।
अब जीवन्मुक्त के लक्षण को दिखाते हैं—
जो जीवन्मुक्त है, वह न किसी की निन्दा करता है, और न स्तुति करता है, और न हर्ष करता है, और न कभी काप को प्राप्त होता है, याने जो संसारी पुरुष जीवन्मुक्त को आदर-सम्मान करते हैं, वह उनकी स्तुति नहीं करता है, और जो उसको निरादर करते हैं; उनकी वह निन्दा नहीं करता है, और न वह अति उत्तम खान-पान आदिकों के प्राप्त होने पर हर्ष को प्राप्त होता है, और न घृत-हीन बासी भोजन मिलने से वह शोक करता है, और न किसी से शरीर के निर्वाह के सिवाय अधिक वस्तु के ग्रहण करने की इच्छा करता है, और न किसी से लेकर दूसरे को देता है, और न किसी से किसी को कुछ दिलवाता है, किन्तु सदा वह अपने आपमें मग्न रहता है ।
**प्रश्न–**संसार में तो लोग नग्न रहनेवाले को जीवन्मुक्त कहते हैं, और कोई-कोई भिक्षा माँगकर खानेवाले को जीवन्मुक्त कहते हैं ।
**उत्तर–**संसारी लोग सकामी होते हैं । जो सकामी होते हैं, उनको नहीं मालूम होता है कि कौन ज्ञानी है, और कौन