भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 277, कुल 405 में से

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पृष्ठ 277

२७० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ । जो विषयों के साथ द्वेष नहीं करता है, और जो विषय- लोलुप नहीं है, किन्तु असंसक्त मनवाला है, अर्थात् जिसका मन कहीं आसक्त नहीं है । प्रारब्धवश से जो प्राप्त होता है, उसको भोगता है । जो नहीं प्राप्त होता, उसकी इच्छा नहीं करता है, वही जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ १७ ॥

मूलम् । समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः । शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः ॥ १८ ॥

पदच्छेदः । समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः शून्यचित्तः, न, जानाति, कैवल्यम्, इव, संस्थितः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
शून्यचित्तः=बाहर से शून्य चित्तवाला ज्ञानीजानाति=जानता है
समाधानासमा-<br>धानहिताहित-<br>विकल्पनाःसमाधान और अस- माधान, हित और अहित की कल्पना कोपरन्तु=<br>कैवल्यम्=परन्तु<br>मोक्ष-रूप
इव=सा
न=नहींसंस्थितः=स्थित है ॥

भावार्थ । जो समाधानता और असमाधानता को अर्थात् हित और अहित की कल्पना को नहीं जानता है, ऐसा शून्य चित्तवाला जो विदेह कैवल्य को प्राप्त हुआ है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १८ ॥