अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 276, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 276
सत्रहवाँ प्रकरण । २६९
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| क्षीणसंसरणे = | क्षीण हुआ है संसार जिसका | न औद्धत्यम् = | न अनम्रता है |
| च = | और | ||
| नरे = | मनुष्य विषे | न दीनता = | न दीनता है |
| न हिंसा = | न हिंसा है | न आश्चर्य्यम् = | न आश्चर्य्य है |
| न कारुण्यम् = | न दयालुता है | न क्षोभः = | न क्षोभ है ॥ |
भावार्थ ।
जो वासना-रहित पुरुषों के साथ न द्रोह करता है और न दीन के साथ करुणा करता है, और न शारीरिक सुख के लिय किसी के आगे हाथ बढ़ाता है, और न कभी आश्चर्य को प्राप्त होता है, और न कभी क्षोभ को प्राप्त होता है, वही पुरुष जीवन्मुक्त है ॥ १६ ॥
मूलम् ।
न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः ।
असंसक्तमनाः नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते ॥ १७ ॥
पदच्छेदः ।
न, मुक्तः, विषयद्वेष्टा, न, वा, विषयलोलुपः, असंसक्तमनाः, नित्यम्, प्राप्ताप्राप्तम्, उपाश्नुते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मुक्तः = | जीवन्मुक्त | नित्यम् = | सदा |
| न विषयद्वेष्टा = | न विषय में द्वेष करने वाला | असंसक्तमनाः = | आसक्ति-रहित मन- वाला होता हुआ |
| वा = | और | प्राप्ताप्राप्तम् = | प्राप्त और अप्राप्त वस्तु को |
| न विषयलोलुपः = | न विषयों में लोभी है | उपाश्नुते = | भोगता है ॥ |