भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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२६८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

सुखे, दुःखे, नरे, नार्याम्, सम्पत्सु, च, विपत्सु, च, विशेषः, न, एव, धीरस्य, सर्वत्र, समदर्शिनः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । सुखे = सुख विषे | विपत्सु = विपत्तियों में दुःखे = दुःख विषे | सर्वत्र = सर्वत्र नरे = नर विषे | समदर्शिनः = समदर्शी नार्याम् = नारी विषे | धीरस्य = ज्ञानी का सम्पत्सु = सम्पत्तियों में | विशेषः = भेद नहीं है ॥

भावार्थ ।

जिसका चित्त सुख-दुःख में सम रहता है, अर्थात् शरीर का अतिसुख होने से जो हर्ष को नहीं प्राप्त होता है, और शरीर को खेद होने से जो शोक को नहीं प्राप्त होता है, और सम्पदा के प्राप्त होने पर जिसको हर्ष नहीं होता है, और विपदा के आने पर जिसको शोक नहीं होता है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १५ ॥

मूलम् ।

न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता । नाश्चर्यं नैव च क्षोभः क्षीणसंसरणे नरे ॥ १६ ॥

पदच्छेदः ।

न, हिंसा, न, एव, कारुण्यम्, न, औद्धत्यम्, न, च, दीनता, न, आश्चर्यम्, न, एव, च, क्षोभः, क्षीणसंसरणे, नरे ॥