भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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सत्रहवाँ प्रकरण । २६७

दार्ष्टान्त—चाहे कितना ही नंगा रहे, वह कदापि जीवन्मुक्त नहीं हो सकता है । जो वासना से रहित है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १३ ॥

मूलम् ।

सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वा मृत्युं वा समुपस्थितम् ।
अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एवमहाशयः ॥ १४ ॥

पदच्छेदः ।

सानुरागाम्, स्त्रियम्, दृष्टवा, मृत्युम्, वा, समुपस्थितम्, अविह्वलमनाः, स्वस्थः, मुक्तः, एव, महाशयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
सानुरागाम् =प्रीति-युक्तअविह्वलमनाः =व्याकुलता-रहित होता हुआ
स्त्रियम् =स्त्री को+ च =और
वा =औरस्वस्थः =शान्त होता हुआ
समुपस्थितम् =समीप में स्थितमहाशयः =महापुरुष
मृत्युम् =मृत्यु कोएव =निश्चय करके
दृष्टवा =देखकरमुक्तः =ज्ञानी है ॥

भावार्थ ।

अनुराग अर्थात् प्रीति के सहित स्त्री को देख करके जिसका मन कामातुर नहीं होता है, और मृत्यु को समीप स्थित देखकर जिसका मन भय को नहीं प्राप्त होता है, किन्तु अपने आत्मा-नन्द में आनन्द रहता है, वही जीवन्मुक्त है ॥ १४ ॥

मूलम् ।

सुखे दुःखे नरे नार्यां संपत्सु च विपत्सु च ।
विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः ॥ १५ ॥