भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 405 में से

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पृष्ठ 280

अठारहवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

यस्य बोधोदये तावत्स्वप्नवद्भवति भ्रमः ।
तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

यस्य, बोधोदये, तावत्, स्वप्नवत्, भवति, भ्रमः, तस्मै, सुखैकरूपाय, नमः, शान्ताय, तेजसे ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यस्य बोधोदये =जिसके बोध के उदय होने परतस्मै =उस
सुखैकरूपाय =आनन्द-रूप
तावत् =पहलेशान्ताय =शान्त-रूप
भ्रमः =भ्रान्तिच =और
स्वप्नवत् =स्वप्न के समानतेजसे =तेजमय रूप को
भवति =होती हैनमः =नमस्कार है ॥

भावार्थ ।

अब अठाहरवें प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं—
इस प्रकरण में शान्ति की प्रधानता को दिखलाते हुए