भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 281

२७४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

प्रथम शान्त-रूप परमात्मा को नमस्कार करते हैं । जो आत्मा शान्त-रूप है, जिसमें सङ्कल्प-विकल्प नहीं उत्पन्न होते हैं, और जो सुख और प्रकाश-स्वरूप है, जिसके स्वरूप के ज्ञान होते ही जगद्भ्रम स्वप्न की तरह मिथ्या प्रतीत होने लगता है, उस आत्मा को नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥

मूलम् ।

अर्जयित्वाऽखिलानर्थान भोगानाप्नोति पुष्कलान् ।
नहिसर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत् ॥ २ ॥

पदच्छेदः ।

अर्जयित्वा, अखिलान्, अर्थान्, भोगान्, आप्नोति, पुष्कलान्, न, हि, सर्वपरित्यागम्, अन्तरेण, सुखी, भवेत् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अखिलान्=संपूर्णआप्नोति=प्राप्त होता है
अर्थान्=धनों कोपरन्तु=परन्तु
अर्जयित्वा=जोड़ करकेसर्वपरित्यागम्=सबके परित्याग के
पुष्कलान्=सबअन्तरेण=बिना
भोगान्=भोगों कोसुखी=सुखी
+ पुरुष=पुरुषन भवेत्=नहीं होता है ॥
हि=अवश्य

भावार्थ ।

प्रश्न– धनी लोग भी तो संसार में सुखी दिखाई पड़ते हैं, उनमें और ज्ञानी में क्या भेद है ?