अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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२७४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
प्रथम शान्त-रूप परमात्मा को नमस्कार करते हैं । जो आत्मा शान्त-रूप है, जिसमें सङ्कल्प-विकल्प नहीं उत्पन्न होते हैं, और जो सुख और प्रकाश-स्वरूप है, जिसके स्वरूप के ज्ञान होते ही जगद्भ्रम स्वप्न की तरह मिथ्या प्रतीत होने लगता है, उस आत्मा को नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
मूलम् ।
अर्जयित्वाऽखिलानर्थान भोगानाप्नोति पुष्कलान् ।
नहिसर्वपरित्यागमन्तरेण सुखी भवेत् ॥ २ ॥
पदच्छेदः ।
अर्जयित्वा, अखिलान्, अर्थान्, भोगान्, आप्नोति, पुष्कलान्, न, हि, सर्वपरित्यागम्, अन्तरेण, सुखी, भवेत् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अखिलान् | =संपूर्ण | आप्नोति | =प्राप्त होता है |
| अर्थान् | =धनों को | परन्तु | =परन्तु |
| अर्जयित्वा | =जोड़ करके | सर्वपरित्यागम् | =सबके परित्याग के |
| पुष्कलान् | =सब | अन्तरेण | =बिना |
| भोगान् | =भोगों को | सुखी | =सुखी |
| + पुरुष | =पुरुष | न भवेत् | =नहीं होता है ॥ |
| हि | =अवश्य |
भावार्थ ।
प्रश्न– धनी लोग भी तो संसार में सुखी दिखाई पड़ते हैं, उनमें और ज्ञानी में क्या भेद है ?