भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 405 में से

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पृष्ठ 258

सत्रहवाँ प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।

तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा ।
तृप्तःस्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकीरमते तु यः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।

तेन, ज्ञानफलम्, प्राप्तम्, योगाभ्यासफलम्, तथा, तृप्तः, स्वच्छेन्द्रियः, नित्यम्, एकाकी, रमते, तु, यः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यः=जो पुरुषतेन=उसी करके
नित्यम्=नित्यज्ञानफलम्=ज्ञान का फल
तृप्तः=तृप्त हैतथा=और
स्वच्छेन्द्रियः=शुद्ध इन्द्रियवाला हैयोगाभ्यासफलम्= योगके अभ्यास का फल
=औरप्राप्तम्=पाया गया है ॥
एकाकी=अकेला
रमते=रमता है

भावार्थ ।

अब विंशति श्लोकों करके सत्रहवें प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं। रइतपुरुषों की प्रवृत्ति ब्रह्म-विद्या में कराने के लिये और आत्मज्ञान का फल दिखाने के वास्ते गुरु प्रथम ज्ञान की दशा को दिखाते हैं ।