अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 257, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें२५० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
धोती, नेती, वस्ती आदिक क्रिया करता हूँ, वह भी योगी नहीं है, किन्तु वह केवल दुःख का भोगनेवाला है ॥ १० ॥
मूलम् ।
हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा । तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणादृते ॥ ११ ॥
पदच्छेदः ।
हरः, यदि, उपदेष्टा, ते, हरिः, कमलजः, अपि, वा, तथा, अपि, न, तव, स्वास्थ्यम्, सर्वविस्मरणात्, ऋते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदि | = अगर | तथापि | = तो भी |
| ते | = तेरा | सर्वविस्मरणात् ऋते | = बिना सबके विस्मरण के याने त्याग के |
| उपदेष्टा | = उपदेशक | ||
| हरः | = शिव है | ||
| हरि | = विष्णु है | तव | = तुझको |
| वा | = अथवा | स्वास्थ्यम् | = शान्ति |
| कमलजः | = ब्रह्मा है | न | = नहीं होगी ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! चाहे तुमको महादेव उपदेश करें या विष्णु उपदेश करें या ब्रह्मा उपदेश करें, तुमको सुख कदापि न होगा । जब विषयों का त्याग करोगे, तभी शान्ति और आनन्द को प्राप्त होगे । आत्मतत्त्व के उपदेश के पहिले विषयों का त्याग बहुत जरूरी है ॥११॥
इति श्री अष्टावक्रगीतायां षोडशकं प्रकरणं समाप्तम् ॥१६॥
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