भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 283

२७६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

मूलम् ।

कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः ।
कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम् ॥ ३ ॥

पदच्छेदः ।

कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः, कुतः, प्रशम-पीयूषधारासारम्, ऋते, सुखम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
कर्तव्यदुःख-मार्तण्डज्वाला-दग्धान्तरात्मनः =कर्म-जन्य दुःख-रूपीसूर्य के ज्वाला से भस्म हुआ है मन जिसका, ऐसे पुरुष कोप्रशमपीयूष-धारासारम् =शान्ति-रूपी अमृत की धारा की वृष्टि
ऋते =बिना
सुखम् =सुख
कुतः =कहाँ

भावार्थ ।

कर्तव्य-रूपी जितने कर्म हैं, उनसे जन्य जो दुःख हैं, वही एक सूर्य की तप्तरूपा अग्नि है । उस अग्नि करके जिसका मन दग्ध हो रहा है, उसको शान्ति-रूपी अमृत-जल के बिना कदापि सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती है ॥ ३ ॥

मूलम् ।

भवोऽयं भावनामात्रो न किञ्चित्परमार्थतः ।
नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम् ॥ ४ ॥