अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 284, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ प्रकरण । २७७
पदच्छेदः ।
भवः, अयम्, भावनामात्रः, न, किञ्चित्, परमार्थतः, न, अस्ति, अभावः, स्वभावानाम्, भावाभावविभाविनाम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अयम् = | यह | हि = | क्योंकि |
| भवः = | संसार | भावाभावविभाविनाम् = | $\left{\begin{matrix} भाव-रूप और \ अभाव-रूप पदार्थों \ में स्थित हुए \end{matrix}\right.$ |
| भावनामात्रः = | $\left{\begin{matrix} भावना-मात्र है \ अर्थात् संकल्प- \ मात्र है । \end{matrix}\right.$ | स्वभावानाम् = | स्वभावों का |
| परमार्थतः = | परमार्थ से | अभावः = | अभाव |
| किञ्चित् = | कुछ | न अस्ति = | नहीं होता है ॥ |
| न = | नहीं है |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! यह जगत् संकल्प-मात्र है । परमार्थ-दृष्टि से तो आत्मा से अतिरिक्त कोई भी वस्तु भाव-रूप अर्थात् सत्य-रूप नहीं है, आत्मा ही सत्य-रूप है, और संपूर्ण प्रपंच अभाव-रूप है अर्थात् असत्य-रूप है ।
प्रश्न—अभाव-रूप प्रपंच भी कालादिकों के वश से भाव स्वभाववाला हो जावेगा ?
उत्तर—भाव-रूप और अभाव-रूप में स्थित स्वभावों का अभाव-रूप कदापि नहीं हो सकता है अर्थात् भाव पदार्थ का अभाव कदापि नहीं होता है और अभाव पदार्थ का भाव कदापि नहीं होता है। जैसे मनोराज के और स्वप्न के पदार्थों का कदापि भाव नहीं होता है, वैसे प्रपंच के पदार्थों का कदापि