अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 285, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें२७८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भाव नहीं होता है। जैसे मनोराज स्वप्न के पदार्थ सब संकल्प मात्र हैं, वैसे जाग्रत् के पदार्थ भी सब संकल्प-मात्र हैं। संकल्प के दूर होने से संसार-रूपी ताप भी दूर हो जाता है। संकल्पों का नाश ही मोक्ष का हेतु है ॥ ४ ॥
मूलम् ।
न दूरं न च संकोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम् । निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम् ॥ ५ ॥
पदच्छेदः ।
न, दूरम्, न, च, संकोचात्, लब्धम्, एव, आत्मनः, पदम्, निर्विकल्पम्, निरायासम्, निर्विकारम्, निरञ्जनम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| आत्मनः = | आत्मा का | संकोचात् लब्धम् न=$ | संकोच से प्राप्त नहीं है अर्थात् परिच्छिन्न नहीं है |
| पदम् = | स्वरूप | निर्विकल्पम् = | संकल्प-रहित है |
| दूरम् = | दूर | निरायासम् = | प्रयत्न-रहित है |
| न = | नहीं है | निर्विकारम् = | विकार-रहित है |
| च = | और | निरञ्जनम् = | दुःख रहित है ॥ |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**संकल्प के दूर करने-मात्र से कैसे आत्मा-रूपी अमृत की प्राप्ति होती है ?
**उत्तर—**आत्मा किसी की दूर नहीं है और आत्मा परिच्छिन्न भी नहीं है, क्योंकि सर्वत्र व्यापक है, इसी वास्ते आत्मा नित्य ही प्राप्त है । मन के संकल्प के वश से अज्ञानी पुरुष आत्मा को अप्राप्त की नाईं मानते हैं ।