अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 286, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ प्रकरण । २७९
जैसे किसी पुरुष के कंठ में स्वर्ण का भूषण पड़ा है, तथापि उसके भ्रम के वश से ऐसा ज्ञान होता है कि मेरा भूषण कहीं खो गया है । यद्यपि वह भूषण उसको प्राप्त भी है, परन्तु भ्रम करके अप्राप्त की तरह प्रतीत होता है । वैसे ही यह आत्मा सर्व पुरुषों को नित्य प्राप्त भी है, पर अपने स्वरूप के अज्ञान होने से संकल्पों के वश से अप्राप्त की तरह हो रहा है । आत्मा विकल्पों से अतीत है अर्थात् मन के विकल्पों के अभाव हो जाने से जाना जाता है । एवं वह विकारों से भी रहित है, और उपाधियों से शून्य है और सदैव एकरस है ॥ ५ ॥
मूलम् । व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः ॥ ६ ॥
पदच्छेदः । व्यामोहमात्रविरतौ, स्वरूपादानमात्रतः, वीतशोकाः, विराजन्ते, निरावरणदृष्टयः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| व्यामोहमात्र-विरतौ = | विशेष मोह के निवृत्त होने पर | वीतशोकाः = | शोक से रहित |
| निरा-<br>वरण=<br>दृष्टयः | आवरण रहित दृष्टिवाले अर्थात् ज्ञानी पुरुष | ||
| स्वरूपादान-मात्रतः = | अपने स्वरूप के ग्रहणमात्र से ही | विराजन्ते = | शोभायमान होते हैं ॥ |
भावार्थ । **प्रश्न—**जब आत्मा नित्य ही प्राप्त है, तब फिर शास्त्र के