अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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अठारहवाँ प्रकरण । २८५
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| उपशान्तस्य=शान्त हुए | न अतिबोधः=न बोध है |
| योगिनः=योगी को | न मूढ़ता=न मूर्खता है |
| न विक्षेपः=न विक्षेप है | न सुखम्=न सुख है |
| च=और | वा=और |
| न एकाग्रत्वम्=न एकाग्र- ता है | न दुःखम्=न दुःख है ॥ |
भावार्थ ।
अब संकल्प से रहित मन के स्वरूप को दिखाते हैं । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जिसका मन संकल्प-विकल्प से रहित हो गया है, उसको न विक्षेप होता है, और न वह एकाग्रता के लिये उद्यम करता है । क्योंकि जिसको विक्षेप होता है, वही निरोध के लिये यत्न करता है । उसको पदार्थों का अत्यन्त ज्ञान या मूढ़ता नहीं होती है, और न उसको विषयजन्य सुख या दुःख होता है । क्योंकि वह केवल आत्मानन्द में मग्न है ॥ १० ॥
मूलम् ।
स्वराज्ये भैक्ष्यवृत्तौ च लाभालाभे जने वने ।
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः ॥११॥
पदच्छेदः ।
स्वराज्ये, भैक्ष्यवृत्तौ, च, लाभालाभे, जने, वने, निर्वि- कल्पस्वभावस्य, न, विशेषः, अस्ति, योगिनः ॥