भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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२८६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
स्वराज्ये =राज्य मेंवने =वन में
भैक्ष्यवृत्तौ =भिक्षा-वृत्ति मेंनिर्विकल्प-स्वभावस्य =विकल्प-रहित स्वभाववाले
लाभालाभे =लाभ और अ- लाभ मेंयोगिनः =योगी को
जने =मनुष्यों के समूह मेंविशेषः =कोई विशेषता
वा =यान अस्ति =नहीं है ॥

भावार्थ ।

जीवन्मुक्त को स्वर्ग के राज्य मिलने पर भी न उसको हर्ष होता है, और भिक्षा-वृत्ति में न उसको विक्षेप होता है, और पदार्थ का लाभ और अलाभ दोनों उसको बराबर हैं, वन में रहे व घर में रहे, वह एकरस रहता है ॥ ११ ॥

मूलम् ।

क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकत्ता ।
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः ॥ १२ ॥

पदच्छेदः ।

क्व, धर्मः, क्व, च, वा, कामः, क्व, च, अर्थः, क्व, विवेकत्ता, इदम्, कृतम्, न, इति, द्वन्द्वैः, मुक्तस्य, योगिनः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
इदम् =यहइति =इस प्रकार
कृतम् =किया गया हैद्वन्द्वैः =द्वन्द्व से
इदम् =यहमुक्तस्य =छूटे हुए
न कृतम् =नहीं किया गया हैयोगिनः =योगी को