अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 294, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ प्रकरण । २८७
धर्मः=धर्म | अर्थः=अर्थ क्व=कहाँ है | क्व=कहाँ है वा=और | च=और कामः=काम | विवेकता=विचार क्व=कहाँ है | क्व=कहाँ है ।। च=और |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि स्थिर चित्तवाले योगी को धर्म, काम और अर्थ के साथ कुछ प्रयोजन नहीं रहता है, और इस काम को मैंने कर लिया है, या इसको मैं करूँगा, इस प्रकार के द्वन्द्वों से जो रहित है, वही जीवन्मुक्त योगी है ॥ १२ ॥
मूलम् ।
कृत्यं किमपि न एव न कापि हृदि रञ्जना । यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः ॥ १३ ॥
पदच्छेदः ।
कृत्यम्, किम्, अपि, न, एव, न, का, अपि, हृदि, रञ्जना, यथा, जीवनम्, एव, इह, जीवन्मुक्तस्य, योगिनः ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । जीवन्मुक्तस्य=जीवन्मुक्त | च=और योगिनः=योगी को | न=न कृत्यम्=कर्तव्य कर्म | हृदि=मन में किम् अपि न एव=कुछ भी नहीं है | का अपि=कोई भी