भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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२८८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

रञ्जना अपि = अनुराग ही है<br>इह = इस संसार में<br>यथा = जैसे<br>जीवनम् = जीवन हैएव = वैसा ही है अर्थात् उसका भोगकर्मानु- सार है ॥

भावार्थ ।

प्रश्न—जब जीवन्मुक्त कोई क्रिया नहीं करेगा, तब उसके शरीर का निर्वाह कैसे होगा ?

उत्तर—जीवन्मुक्त पुरुष की कोई क्रिया अपने संकल्प से नहीं होती है, और न कुछ उसको करने-योग्य कर्म बाकी रहा है । क्योंकि उसको किसी पदार्थ में राग नहीं है, और राग के बिना कोई कृत्य कर्म है नहीं, और राग-द्वेष का हेतु जो अविद्या है, वह उसकी नष्ट हो गई है । उसके शरीर की यात्रा प्रारब्धवश से होती है ॥ १३ ॥

मूलम् ।

क्व मोहः क्व च वा विश्वं क्व तद्ध्यानं क्व मुक्तता ।
सर्वसंकल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः ॥ १४ ॥

पदच्छेदः ।

क्व, मोहः, क्व, च, वा, विश्वम्, क्व, तत्, ध्यानम्, क्व, मुक्तता, सर्वसंकल्पसीमायाम्, विश्रान्तस्य, महात्मनः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
सर्वसंकल्प-सीमायाम् =संपूर्ण संकल्पों की सीमा में अर्थात् आत्मज्ञान मेंक्व =कहाँ
मोह =मोह है
=और
विश्रान्तस्य =विश्रान्त हुएक्व =कहाँ
योगिनः =योगी कोविश्वम् =संसार है