भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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अठारहवाँ प्रकरण । २९३

मूलम् ।

भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः ।
नैव किञ्चित् कृतं तेन लोकदृष्टचा विकुर्वता ॥१९॥

पदच्छेदः ।

भावाभावविहीनः, यः, तृप्तः, निर्वासनः, बुधः, न, एव, किञ्चित्, कृतम्, तेन, लोकदृष्टचाः, विकुर्वता ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यः =जोनिर्वासनः =वासना-रहित है
तृप्तः =तृप्त हुआलोकदृष्टचा =लोक दृष्टि में
बुधः =ज्ञानीतेन =उस
भावाभाव-विहीनः =भाव और अभाव से रहित हैकुर्वता =किये हुए करके
च =औरकिञ्चित् एव =कुछ भी
न कृतम् =नहीं किया गया है ॥

भावार्थ ।

जो विद्वान् अपने आत्मानन्द करके ही तृप्त है, वह स्तुति और निन्दा आदिकों से रहित है, क्योंकि वह लोक दृष्टि से कर्त्ता हुआ भी अकर्त्ता है। आत्मज्ञान करके उसके कर्त्तृत्वादि अध्यास सब नष्ट हो गए हैं।


मूलम् ।

प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः ।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठतः सुखम् ॥२०॥