भारतकोश
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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

अठारहवाँ प्रकरण । २९३

मूलम् ।

भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः ।
नैव किञ्चित् कृतं तेन लोकदृष्टचा विकुर्वता ॥१९॥

पदच्छेदः ।

भावाभावविहीनः, यः, तृप्तः, निर्वासनः, बुधः, न, एव, किञ्चित्, कृतम्, तेन, लोकदृष्टचाः, विकुर्वता ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यः =जोनिर्वासनः =वासना-रहित है
तृप्तः =तृप्त हुआलोकदृष्टचा =लोक दृष्टि में
बुधः =ज्ञानीतेन =उस
भावाभाव-विहीनः =भाव और अभाव से रहित हैकुर्वता =किये हुए करके
च =औरकिञ्चित् एव =कुछ भी
न कृतम् =नहीं किया गया है ॥

भावार्थ ।

जो विद्वान् अपने आत्मानन्द करके ही तृप्त है, वह स्तुति और निन्दा आदिकों से रहित है, क्योंकि वह लोक दृष्टि से कर्त्ता हुआ भी अकर्त्ता है। आत्मज्ञान करके उसके कर्त्तृत्वादि अध्यास सब नष्ट हो गए हैं।


मूलम् ।

प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः ।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठतः सुखम् ॥२०॥

२९४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः । प्रवृत्तौ, वा, निवृत्तौ, वा, न, एव, धीरस्य, दुग्रहः, यदा, यत्, कर्त्तुम्, आयाति, तत्, तिष्ठतः, सुखम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा =जब कभीतिष्ठतः =समाधिस्थ
यत् =जो कुछ कर्मधीरस्य =ज्ञानी पुरुष को
कर्त्तुम् =करने कोप्रवृत्तौ =प्रवृत्ति में
आयाति =आ पड़ता हैवा =अथवा
तत् =उसकोनिवृत्तौ =निवृत्ति में
सुखम् =सुख पूर्वकदुग्रहः =दुराग्रह
कृत्वा =करकेन एव =कभी नहीं है ॥

भावार्थ । विद्वान् को प्रवृत्ति में और निवृत्ति में कोई आग्रह अर्थात् हठ नहीं है । क्योंकि वह कर्त्तृत्वादि अभिमान से रहित है । यदि प्रारब्ध के वश से विद्वान् को प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति करने को पड़ जावे, तब वह सुखपूर्वक उनको करता है, और असंग भी बना रहता है । क्योंकि उसको कर्त्तृत्वादिकों का अभिमान नहीं है ॥ २० ॥

मूलम् । निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः ।
क्षिप्तः संसारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत् ॥ २१ ॥

पदच्छेदः । निर्वासनः, निरालम्बः, स्वच्छन्दः, मुक्तबन्धनः, क्षिप्तः, संसारवातेन, चेष्टते, शुष्कपर्णवत् ॥

अठारहवाँ प्रकरण । २९५

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
निर्वासनः =वासना-रहितसंसारवातेन =प्रारब्ध-रूपीपवन करके
निरालम्बः =आलम्ब-रहित
स्वच्छन्दः =स्वेच्छाचारीक्षिप्तः =प्रेरणा किया हुआ
मुक्तबन्धनः =बन्धन-रहितशुष्कपर्णवत् =सूखे पत्ते की तरह
ज्ञानिनः =ज्ञानीचेष्टते =चेष्टा करता है

भावार्थ ।

**प्रश्न—**यदि ज्ञानी निर्वासनिक है, तब वह किस करके प्रेरणा किया हुआ कर्मों को करता है ।

**उत्तर—**ज्ञानी जिस हेतु करके निर्वासनिक है, उसी हेतु करके वह निरालम्ब भी है; अर्थात् कर्त्तव्यता का जो अनु-संधान अर्थात् चिन्तन है, उससे वह रहित है, और स्वच्छन्द भी है अर्थात् वह राग-द्वेषादिकों के अधीन है । और बन्ध का हेतु जो अज्ञान है, उससे रहित है । जैसे सूखा पत्ता वायु करके प्रेरा हुआ इधर-उधर डोलता है, वैसे ही ज्ञानी प्रारब्ध-रूपी वायु करके चलाया हुआ इधर-उधर फिरता है ॥ २१ ॥

मूलम् ।

असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादता । स शीतलमना नित्यं विदेह इव राजते ॥ २२ ॥

पदच्छेदः ।

असंसारस्य, तु, क्व, अपि, न, हर्ष, न, विषादता, सः, शीतलमनः, नित्यम्, विदेहः, इव, राजते ॥

२९६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
असंसारस्य=ज्ञानी कोविषादता=शोक है
न=नसः=वह
तु=तोशीतलमना=शान्त मनवाला
क्व अपि=कभीनित्यम्=सदा
हर्षः=हर्ष हैविदेहःइव=मुक्त की तरह
च=औरराजते=शोभायमान रहता है ॥
न=न

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! ज्ञानी संसार से रहित है । संसार का हेतु अर्थात् कारण अज्ञान जिसमें न रहे, उसी का नाम असंसारी है और हर्ष विषादादि भी उसमें नहीं उत्पन्न होते हैं, इसी से वह शीतल हृदय है और विदेहमुक्त की तरह वह रहता है ॥ २२ ॥

मूलम् ।

कुत्रापि न जिहासाऽस्ति आशा वाऽपि न कुत्रचित् ।
आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः ॥ २३ ॥

पदच्छेदः ।

कुत्र, अपि, न, जिहासा, अस्ति, आशा, वा, अपि, न, कुत्रचित्, आत्मारामस्य, धीरस्य, शीतलाच्छतरात्मनः ॥

अठारहवाँ प्रकरण । २९७

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आत्मारामस्य =आत्मा में रमण करनेवालेजिहासा =त्याग की इच्छा
अस्ति =है
शीतलाच्छत-रात्मनः =शीतल और अति निर्मल चित्तवालेवा अपि =और
न =
धीरस्य =ज्ञानी कोकुत्रचित् =कहीं
न =आशा =ग्रहण की इच्छा
कुत्र अपि =कहींअस्ति =है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! अपने आत्मा में ही जो नित्य रमण करने-वाला है, उसका चित्त भी स्थिर रहता है । उसकी इच्छा किसी पदार्थ के ग्रहण और त्याग में नहीं रहती है और न वह अनर्थ को करता है, क्योंकि अनर्थ का हेतु उसमें बाकी नहीं रहा है ॥ २३ ॥

मूलम् ।

प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया ।
प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता ॥ २४ ॥

पदच्छेदः ।

प्रकृत्या, शून्यचित्तस्य, कुर्वतः, अस्य, यदृच्छया, प्राकृतस्य, इव, धीरस्य, न मानः, न, अवमानता ॥

२९८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
प्रकृत्या =स्वभाव सेधीरस्य =ज्ञानी को
यदृच्छया =प्रारब्ध करकेन =
प्राकृतस्य =अज्ञानी कीमानः =मान है
इव =तरहच =और
कुर्वतः =करता हुआन =
अस्य =इसअवमानता =अपमान है ॥
शून्यचित्तस्य =विकार रहित चित्तवाले

भावार्थ ।

स्वभाव से ही जिसका चित्त शून्य है, अर्थात् विकार से रहित है, कदापि विकारी नहीं होता है । आत्मा में ही जो शान्ति को प्राप्त हुआ है, ऐसा जो ज्ञानवान् पुरुष है, व अज्ञानी की तरह प्रारब्धवश से चेष्टा को करता हुआ भी हर्ष और शोक को नहीं प्राप्त होता है । अपने मान-अपमान का भी उसका अनुसंधान नहीं है ॥ २४ ॥

अब ज्ञानी के अनुभव को दिखाते हैं—

मूलम् ।

कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा ।
इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न ॥ २५ ॥

पदच्छेदः ।

कृतम्, देहेन, कर्म, इदम्, न, मया, शुद्धरूपिणा, इति, चिन्तानुरोधी, यः, कुर्वन्, अपि, करोति, न ॥

अठारहवां प्रकरण । २९९

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
इदम्= यहइति= इस प्रकार
कर्म= कर्मयः= जो
देहेन= देह करकेचिन्तानुरोधी= चिन्ता करनेवाला
कृतम्= किया गयासः= वह
मया= मुझकुर्वन्= कर्म करता हुआ
शुद्धरूपिणा= शुद्ध-रूप करकेअपि= भी
= नहींन करोति= नहीं करता है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! ज्ञानी ऐसा मानता है कि यह कर्म देह ने किया है, शुद्ध-रूप आत्मा ने नहीं किया है । इसी कारण वह कर्मों को करता हुआ भी कुछ नहीं करता है ।

**प्रश्न—**अज्ञानी पुरुष व्यभिचार कर्मों को करके यदि ऐसा कहे कि यह सब कर्म देह ने किया है, तब उसकी भी मुक्ति होनी चाहिए ?

**उत्तर—**अज्ञानी को कर्मों के फल में अध्यास बना रहता है, क्योंकि शुभ कर्म करने से उसके चित्त में हर्ष उत्पन्न होता है और अशुभ कर्म करने से उसके चित्त में भय और लज्जा उत्पन्न होती है, और व्यभिचार-कर्म करने में छिपाने का प्रयत्न करता है, इस वास्ते उसका निश्चय कच्चा है, वह कदापि मुक्त नहीं हो सकता है, और ज्ञानवान् का व्यवहार उससे उलटा है । शुभ कर्म करने से उसके चित्त में हर्ष नहीं होता है और अशुभ कर्म करने से उसके चित्त में भय और लज्जा नहीं होती है । और व्यभिचार-कर्म करने

३०० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

के लिये वह प्रयत्न नहीं करता है । जिस पुरुष का स्त्री आदिकों में राग होता है और जो उसके संग से आनन्द मानता, वही अज्ञानी व्यभिचार के लिये प्रयत्न करता है । जिस पुरुष को कभी मिश्री खाने को नहीं मिली है और न उसके रस को जानता है, वही गुड़ या राब के खाने के लिये यत्न करता है। जिसको नित्य ही मिश्री खाने को मिलती है, वह कदापि गुड़ के रस के लिये यत्न नहीं करता है । जो नीम का कीट है या विष्ठा का ही है, वह मिश्री के स्वाद को नहीं जानता । अज्ञानी पुरुष विष्टा-रूपी विषयानन्द का स्वाद लेनेवाला है । ज्ञानवान् आत्मानन्द-रूपी मिश्री के स्वाद का लेनेवाला है, इस वास्ते अज्ञानी के आनन्द को नहीं जान सकता है ॥ २५ ॥

मूलम् ।

अतद्वादीव कुरुते न भवेदपि बालिशः ।
जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते ॥ २६ ॥

पदच्छेदः ।

अतद्वादी, इव, कुरुते, न, भवेत्, अपि, बालिश, जीवन्मुक्तः, सुखी, श्रीमान्, संसरन्, अपि, शोभते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अतद्वादी इव =उल्टा याने विरुद्ध उस कहनेवाले की तरह किअपि =तो भी
अहं इदं कार्यं न करिष्यामि =मैं इस कार्य को नहीं करूँगाबालिशः =मूर्ख
जीवन्मुक्तः =ज्ञानीन भवेत् =नहीं होता है अर्थात् मोह को नहीं प्राप्त होता है
कुरुते =कार्य को करता हैअतएव =इसी लिये
संसरन् =व्यवहार को करता हुआ

अठारहवाँ प्रकरण । ३०१

सः = वह | श्रीमान् = शोभायमान
सुखी = सुखी | शोभते = शोभा को प्राप्त होता है ॥

भावार्थ ।

मैं इस कार्य को करूँगा ऐसा न कहता हुआ जीवन्मुक्त प्रारब्धवश से कार्य को करता है, पर बालक की तरह वह मूर्ख नहीं हो जाता है। सांसारिक व्यवहार को करता हुआ भी वह प्रसन्न शान्तचित्तवाला शोभायमान प्रतीत होता है ॥ २६ ॥

मूलम् ।

नानाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः ।
न कल्पते न जानाति न शृणोति न पश्यति ॥ २७ ॥

पदच्छेदः ।

नानाविचारसुश्रान्तः, धीरः, विश्रान्तिम्, आगतः, न, कल्पते, न, जानाति, न, शृणोति, न, पश्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यतः= जिस कारणअतएव= इसी कारण
नानाविचार-सुश्रान्तः= द्वैत के विचार से निवृत्त हुआसः= वह
धीरः= ज्ञानीन कल्पते= न कल्पना करता है
विश्रान्तिम्= शान्ति कीन जानाति= न जानता है
आगतः= प्राप्त हुआ हैन शृणोति= न सुनता है
न पश्यति= न देखता है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! नाना प्रकार के विचारों से रहित ज्ञानी अन्तरात्मा

३०२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

में ही शान्ति को प्राप्त रहता है। वह संकल्पादिक मन के व्यापारों को नहीं करता है और न बुद्धि के व्यापारों को करता है, और न वह इन्द्रियों के व्यापारों को करता है, क्योंकि उसमें कर्त्तत्वादिकों का अभिमान नहीं है ॥ २७ ॥

मूलम् ।

असमाधेरविक्षेपान्न मुमुक्षुर्न चेतरः । निश्चित्य कल्पितं पश्यन् ब्रह्मैवास्तेमहाशयः ॥ २८ ॥

पदच्छेदः ।

असमाधेः, अविक्षेपात्, न, मुमुक्षुः, न, च, इतरः, निश्चित्य, कल्पितम्, पश्यन्, ब्रह्म, एव, आस्ते, महाशयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
महाशयः=ज्ञानीनिश्चित्य=निश्चय करके
असमाधेः=समाधि रहित होने सेइदम् सर्वम्=इस सब जगत् को
मुमुक्षुः न=मुमुक्ष नहीं हैकल्पितम्=कल्पित
च=औरपश्यन्=समझता हुआ
अविक्षेपात्=द्वैत भ्रम के अभाव सेब्रह्म एव=ब्रह्मवत्
इतरः न=बद्ध नहीं हैआस्ते=स्थित रहता है ॥
परन्तु=परन्तु

भावार्थ ।

ज्ञानी मुमुक्षु नहीं होता है, क्योंकि विक्षेप की निवृत्ति के लिये मुमुक्षु समाधि को करता है। ज्ञानी में विक्षेप है नहीं, इसी लिये वह समाधि को नहीं करता है। उसमें बन्ध भी नहीं है, क्योंकि

अठारहवाँ प्रकरण । ३०३

द्वैतभ्रम उसका नष्ट हो गया है । जिसको द्वैतभ्रम होता है उसी को बंध भी होता है ।

**प्रश्न—**फिर वह ज्ञानी कैसा है ?

**उत्तर—**वह ब्रह्मरूप है, क्योंकि संपूर्ण जगत् उसको पूर्व ही से कल्पित प्रतीत होता है, पश्चात् वह बाधितानुवृत्ति करके जगत् को देखता है, इसी कारण वह निर्विकार चित्त-वाला ही होता है ॥ २८ ॥

मूलम् ।

यस्यान्तः स्यादहंकारो न करोति करोतिसः । निरहंकारधीरेण न किञ्चिदकृतं कृतम् ॥ २९ ॥

पदच्छेदः ।

यस्य, अन्तः, स्यात्, अहंकारः, न, करोति, करोति, सः, निरहंकारधीरेण, न, किञ्चित्, अकृतम्, कृतम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यस्य=जिसके<br>अन्तः=अन्तःकरण में<br>अहंकारः=अहंकार का अध्यास<br>स्यात्=है<br>सः=वह<br>+यद्यपि लोकदृष्ट्या=यद्यपि लोक-दृष्टि करके<br>न करोति=नहीं कर्म करता है<br>तु अपि=तो भी<br>करोति=मन में सङ्कल्पादि कर्म करता हैनिरहंकारधीरेण=अहंकार-रहित ज्ञानी करके<br>यद्यपि-लोक-दृष्ट्या=यद्यपि लोक- दृष्टि से<br>न किञ्चित्=कुछ भी नहीं<br>कृतम्=किया गया है<br>तथापि=तथापि<br>स्वदृष्ट्या=अपनी दृष्टि से<br>तत्=वह<br>कृतम्=किया गया है ॥

३०४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ । प्रश्न—संसार को देखता हुआ भी वह कैसे ब्रह्म-रूप हो सकता है ? उत्तर—जिस पुरुष के अंतःकरण में अहंकार का अध्यास होता है, वह लोक-दृष्टि करके न करता हुआ भी संकल्पादिकों को करता है । जैसे जब कोई जटारखाकर, धूनी लगाकर, मौन होकर बैठ जाता है, तब लोग कहते हैं कि बाबाजी कुछ नहीं करते हैं। पर वह भीतर मन में संकल्प करता है कि कोई बड़ा आदमी आवे, तो भाँग-बूटी का काम चले; इस तरह से ज्ञानी का व्यवहार नहीं होता है। उसको भीतर से ही संकल्प-विकल्प नहीं फुरते हैं। इसी वास्ते वह कर्तृत्वादि अध्यास से रहित है ॥ २९ ॥

मूलम् । नोद्विग्नं न च संतुष्टमकतृ॑ स्पन्दवर्जितम् । निराशं गतसंदेहं चित्तं मुक्तस्य राजते ॥ ३० ॥

पदच्छेदः । न, उद्विग्नम्, संतुष्टम्, अकर्तृ॑ स्पन्दवर्जितम्, निराशम्, गतसंदेहम्, चित्तम्, मुक्तस्य, राजते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मुक्तस्य=ज्ञानी कानिराशम्=आशा-रहित
$\left.\begin{aligned}अकर्तृ स्पन्द- \ वर्जितम्\end{aligned}\right}=$$\left{\begin{aligned}&कर्तृत्व-रहित और \ &संकल्प विकल्प-रहित\end{aligned}\right.$गतसंदेहम्=संदेह-रहित
चित्तम्=चित्त

अठारहवाँ प्रकरण । ३०५

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
न उद्विग्नम्= न द्वेष हैन संतुष्टम्= न संतोष को
= औरराजते= प्राप्त होता है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि जीवन्मुक्त का चित्त प्रकाश-रूप है, इसी वास्ते वह उद्वेग को नहीं प्राप्त होता है । क्योंकि उद्वेग का हेतु जो द्वैत है, वह उसके चित्त में नहीं रहा है, और संकल्प-विकल्प से भी शून्य है, इसी वास्ते उसका चित्त जगत् से निराश है, और संदेह से भी रहित है । क्योंकि संदेह का हेतु जो अज्ञान है, वह उसमें नहीं रहा ॥ ३० ॥

मूलम् ।

निध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते ।
निर्निमित्तमिदं किन्तु निध्यायति विचेष्टते ॥ ३१ ॥

पदच्छेदः ।

निध्यातुम्, चेष्टितुम्, वा, अपि, यत्, चित्तम्, न, प्रवर्तते, निर्निमित्तम्, इदम्, किन्तु, निध्यायति, विचेष्टते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
ज्ञानिनः= ज्ञानी कावा अपि= अथवा
यत्= जोचेष्टितुम्= चेष्टा करने को
चित्तम्= चित्त हैन प्रवर्तते= नहीं प्रवृत्त होता है
तत्= वहकिन्तु= परन्तु
निध्यातुम्= $\Big{$ निष्क्रिय भाव में स्थित होने कोइदम्= वह चित्त
निर्निमित्तम्= संकल्प-रहित

३०६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

निध्यायति=निश्चल स्थित होता है च=और | विचेष्टते= { नाना प्रकार की चेष्टा को करता है

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि जिस ज्ञानी का चित्त संकल्प-विकल्परूपी चेष्टा करने में प्रवृत्त नहीं होता है, किन्तु वह चित्त के निश्चल और शुद्ध होने से अपने स्वरूप में स्थिर होता है ॥ ३१ ॥

मूलम् ।

तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम् । अथवाऽऽयातिसङ्कोचनमूढः कोऽपि मूढवत् ॥ ३२ ॥

पदच्छेदः ।

तत्त्वम्, यथार्थम्, आकर्ण्य, मन्दः, प्राप्नोति, मूढताम् अथवा, आयाति, सङ्कोचम्, अमूढः, कः, अपि, मूढवत् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
मन्दः=अज्ञानीआयाति=प्राप्त होता है
यथार्थम्तत्त्वम्= { तत्त्व पदार्थ अर्थात् उपनिषदादिकों को=और<br>तथा एव=वैसा ही
आकर्ण्य=सुन करकः अपि=और कोई
मूढताम्= { मूढ़ता अर्थात् संशय-विपर्यय कोअमूढः=ज्ञानी<br>मूढवत्=अज्ञानी की तरह
प्राप्नोति=प्राप्त होता हैमूढताम्= { संशय-विपर्यय अर्थात् व्यवहार को
अथवा=अथवा+वाह्यदृष्ट्या=वाह्य-दृष्टि से
सङ्कोचम्=चित्त की समाधि कोप्राप्नोति=प्राप्त होता है ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३०७

भावार्थ ।

हे शिष्य ! मन्द पुरुष तत् और त्वं पद के कल्पित भेद को श्रुति से श्रवण करके भी संशय-विपर्यय के कारण मूढ़ता को ही प्राप्त होता है अथवा तत् और त्वं पद के अभेद अर्थ के जानने के लिये समाधि को लगाता है । परन्तु हजारों में कोई एक पुरुष अंतर से शान्त चित्तवाला होकर, बाहर से मूढ़वत् व्यवहार करता है ॥ ३२ ॥

मूलम् ।

एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम् । धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः ॥ ३३ ॥

पदच्छेदः ।

एकाग्रता, निरोधः, वा, मूढैः, अभ्यस्यते, भृशम्, धीराः, कृत्यम्, न, पश्यन्ति, सुप्तवत्, स्वपदे, स्थिताः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
एकाग्रता = चित्त की एकाग्रताकृत्यम् = पूर्व कृत्य को अर्थात् चित्त की एकाग्रता को और निरोधता को
वा = या
निरोधः = चित्त की निरोधतान पश्यन्ति = नहीं देखते हैं
मूढैः = अज्ञानियों करकेपरन्तु = परन्तु
भृशम् = अत्यन्तसुप्तवत् = सोए हुए पुरुष की तरह
अभ्यस्यते = अभ्यास किया जाता हैस्वपदे = अपने स्वरूप में
धीराः = ज्ञानी पुरुषस्थिताः = स्थित रहते हैं ॥

३०८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

मुमुक्षुजन चित्त की एकाग्रता के लिये और विपरीत याचना की निवृत्ति के लिये यत्न करते हैं । परन्तु जो धीर पुरुष है, वह कुछ भी पूर्वोक्त कृत्य को नहीं देखता है । क्योंकि वह अपने स्वरूप में ही स्थित है ॥ ३३ ॥

मूलम् ।

अप्रयत्नात्प्रयत्नाद्वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिम् । तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः ॥ ३४ ॥

पदच्छेदः ।

अप्रयत्नात्, प्रयत्नात्, वा, मूढः, न, आप्नोति, निर्वृतिम्, तत्त्वनिश्चयमात्रेण, प्राज्ञः, भवति, निर्वृतः ।

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मूढः=अज्ञानी पुरुषप्राज्ञः=ज्ञानी पुरुष
अप्रयत्नात्=चित्त के निरोध सेतत्त्वनिश्चय-मात्रेण=केवल तत्त्व के निश्चय करने से ही
वा=अथवा
प्रयत्नात्=कर्मानुष्ठान सेनिर्वृतः=कृतार्थ
निर्वृतिम्=परम सुख कोभवति=होता है ॥
न आप्नोति=नहीं प्राप्त होता है

भावार्थ ।

जिस पुरुष को जीव-ब्रह्म की एकता का निश्चय नहीं है, वही पुरुष मूर्ख कहा जाता है। वह पुरुष चाहे चित्त की निरोध-रूपी समाधि को करे अथवा कर्मों के अनुष्ठान को करे, वह कदापि

अठारहवाँ प्रकरण । ३०९

परम सुख को नहीं प्राप्त होता है। क्योंकि आनंद का हेतु जो आत्मा का अनुभव, वह उसको है नहीं और जो विद्वान् ज्ञानी है, वह न समाधि को और न कर्मों को करता है परन्तु निर्वृत्ति को अर्थात् नित्यसुख को प्राप्त होता है। क्योंकि उसको कुछ कर्तव्य बाकी नहीं रहा। गीता में भी कहा है—

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १ ॥

आत्मा में ही जिसकी रति है और अपने आत्मानंद करके ही जो तृप्त है, आत्मा में ही जो संतुष्ट है, बाहर के पदार्थों में जिसको तोष नहीं है, उसको कोई भी कर्तव्य बाकी नहीं रहा है ॥ ३४ ॥

मूलम् ।

शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपञ्चं निरामयम् ।
आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जना ॥ ३५ ॥

पदच्छेदः ।

शुद्धम्, बुद्धम्, प्रियम्, पूर्णम्, निष्प्रपञ्चम्, निरामयम्, आत्मानम्, तम्, न, जानन्ति, तत्र, अभ्यासपराः, जनाः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
तत्र = इस संसार मेंपूर्णम् = पूर्ण
अभ्यासपरा = अभ्यासीनिष्प्रपञ्चम् = प्रपञ्च-रहित
जनाः = मनुष्य = और
तम् = उसनिरामयम् = दुःख-रहित
शुद्धम् = शुद्धआत्मानम् = आत्मा को
बुद्धम् = चैतन्यन जानन्ति = नहीं जानते हैं ॥
प्रियम् = प्रिय

३१० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ । जगत् में कर्मादिकों के अभ्यासपरायण जो अज्ञानी पुरुष हैं, वे उस आत्मा को नहीं जानते हैं, जो शुद्ध है अर्थात् जो मायामल से रहित है, जो स्वप्रकाश है, जो परिपूर्ण है, जो प्रपञ्च से रहित है और जो दुःख के सम्बन्ध से भी रहित है ॥३५॥

मूलम् । नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा । धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः ॥ ३६ ॥

पदच्छेदः । न, आप्नोति, कर्मणा, मोक्षम्, विमूढः, अभ्यासरूपिणा, धन्यः, विज्ञानमात्रेण, मुक्तः, तिष्ठति, अविक्रियः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
विमूढः=अज्ञानीधन्यः=भाग्यवान्
अभ्यासरूपिणा=अभ्यासरूपीपुरुषः=पुरुष
कर्मणा=कर्म सेविज्ञानमात्रेण=केवल ज्ञान करके ही
मोक्षम्=मोक्ष कोमुक्तः=मुक्त हुआ
न आप्नोति=नहीं प्राप्त होता हैतिष्ठति= स्थित रहता है ॥ अर्थात् मोक्ष को प्राप्त होता है ॥
अविक्रियः=क्रिया-रहित'

भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो मूढ़ अज्ञानी जन है, वह कर्मों करके अर्थात् योगाभ्यास-रूप कर्मों करके भी मोक्ष को कदापि नहीं प्राप्त होते हैं ।

अठारहवाँ प्रकरण । ३११

तथाच—न कर्मणा न प्रजया न धनेन ।

कर्मों करके, प्रजा करके, धन करके, पुरुष मोक्ष को कदापि प्राप्त नहीं होता है, परन्तु जिसका अविद्या-मल दूर हो गया है, वह केवल विज्ञान-मात्र करके मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ॥ ३६ ॥

मूलम् ।

मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति । अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्म स्वरूपभाक् ॥ ३७ ॥

पदच्छेदः ।

मूढः, न, आप्नोति, तत्, ब्रह्म, यतः, भवितुम्, इच्छति, अनिच्छन्, अपि, धीरः, हि, परब्रह्मस्वरूपभाक् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यतः=जिस कारणन आप्नोति=नहीं प्राप्त होता है
मूढः=अज्ञानीधीरः=ज्ञानी
ब्रह्म=ब्रह्महि=निश्चय करके
भवितुम्=होने कोअनिच्छन्नपि=नहीं चाहता हुआ भी
इच्छति=इच्छा करता है$\left. परब्रह्मस्वरूप- भाक् \right}=परब्रह्म-स्वरूप का भजनेवाला
ततः=उसी कारण
सः=वहभवति=होता है ॥
तत्=उसको अर्थात् ब्रह्म को

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! अज्ञानी मूढ़ चित्त के निरोध करने से ब्रह्म-रूप होने की इच्छा करता है, इसी

३१२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

वास्ते वह ब्रह्म को नहीं प्राप्त होता है । और जिस धीर ने अपने को ज्ञानी निश्चय कर लिया है, वह मोक्ष की नहीं इच्छा करता हुआ भी मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ३७ ॥

मूलम् ।

निराधारा ग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः । एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः ॥ ३८ ॥

पदच्छेदः ।

निराधाराः, ग्रहव्यग्राः, मूढाः, संसारपोषकाः, एतस्य, अनर्थमूलस्य, मूलच्छेदः, कृतः, बुधैः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
निराधाराः=आधार-रहितअनर्थमूलस्य=अनर्थ-रूप मूलवाले
ग्रहव्यग्राः=दुराग्रहीसंसारस्य=संसार के
मूढाः=अज्ञानमूलच्छेदः=मूल का नाश
संसारपोषकाः= { संसार के पोषण करनेवाले हैंबुधैः=ज्ञानियों करके
एतस्य=इसकृतः=किया गया है ॥

भावार्थ ।

जो मूढ़ अज्ञानी है, उसका ऐसा ख्याल है कि मैं वेदान्त-शास्त्र और आत्मवित् गुरु के आधार के विना ही केवल चित्त के निरोध से ही मोक्ष को प्राप्त हो जाऊँगा, ऐसा दुराग्रही पुरुष संसार से छुड़ानेवाला जो ज्ञान है, उससे पराङ्मुख होता है, इस संसार के मूलाज्ञान को वह छेदन नहीं कर सकता है ॥ ३८ ॥