अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 311, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें३०४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ । प्रश्न—संसार को देखता हुआ भी वह कैसे ब्रह्म-रूप हो सकता है ? उत्तर—जिस पुरुष के अंतःकरण में अहंकार का अध्यास होता है, वह लोक-दृष्टि करके न करता हुआ भी संकल्पादिकों को करता है । जैसे जब कोई जटारखाकर, धूनी लगाकर, मौन होकर बैठ जाता है, तब लोग कहते हैं कि बाबाजी कुछ नहीं करते हैं। पर वह भीतर मन में संकल्प करता है कि कोई बड़ा आदमी आवे, तो भाँग-बूटी का काम चले; इस तरह से ज्ञानी का व्यवहार नहीं होता है। उसको भीतर से ही संकल्प-विकल्प नहीं फुरते हैं। इसी वास्ते वह कर्तृत्वादि अध्यास से रहित है ॥ २९ ॥
मूलम् । नोद्विग्नं न च संतुष्टमकतृ॑ स्पन्दवर्जितम् । निराशं गतसंदेहं चित्तं मुक्तस्य राजते ॥ ३० ॥
पदच्छेदः । न, उद्विग्नम्, संतुष्टम्, अकर्तृ॑ स्पन्दवर्जितम्, निराशम्, गतसंदेहम्, चित्तम्, मुक्तस्य, राजते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मुक्तस्य= | ज्ञानी का | निराशम्= | आशा-रहित |
| $\left.\begin{aligned}अकर्तृ स्पन्द- \ वर्जितम्\end{aligned}\right}=$ | $\left{\begin{aligned}&कर्तृत्व-रहित और \ &संकल्प विकल्प-रहित\end{aligned}\right.$ | गतसंदेहम्= | संदेह-रहित |
| चित्तम्= | चित्त |