भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 310

अठारहवाँ प्रकरण । ३०३

द्वैतभ्रम उसका नष्ट हो गया है । जिसको द्वैतभ्रम होता है उसी को बंध भी होता है ।

**प्रश्न—**फिर वह ज्ञानी कैसा है ?

**उत्तर—**वह ब्रह्मरूप है, क्योंकि संपूर्ण जगत् उसको पूर्व ही से कल्पित प्रतीत होता है, पश्चात् वह बाधितानुवृत्ति करके जगत् को देखता है, इसी कारण वह निर्विकार चित्त-वाला ही होता है ॥ २८ ॥

मूलम् ।

यस्यान्तः स्यादहंकारो न करोति करोतिसः । निरहंकारधीरेण न किञ्चिदकृतं कृतम् ॥ २९ ॥

पदच्छेदः ।

यस्य, अन्तः, स्यात्, अहंकारः, न, करोति, करोति, सः, निरहंकारधीरेण, न, किञ्चित्, अकृतम्, कृतम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यस्य=जिसके<br>अन्तः=अन्तःकरण में<br>अहंकारः=अहंकार का अध्यास<br>स्यात्=है<br>सः=वह<br>+यद्यपि लोकदृष्ट्या=यद्यपि लोक-दृष्टि करके<br>न करोति=नहीं कर्म करता है<br>तु अपि=तो भी<br>करोति=मन में सङ्कल्पादि कर्म करता हैनिरहंकारधीरेण=अहंकार-रहित ज्ञानी करके<br>यद्यपि-लोक-दृष्ट्या=यद्यपि लोक- दृष्टि से<br>न किञ्चित्=कुछ भी नहीं<br>कृतम्=किया गया है<br>तथापि=तथापि<br>स्वदृष्ट्या=अपनी दृष्टि से<br>तत्=वह<br>कृतम्=किया गया है ॥