अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 312, कुल 405 में से
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अठारहवाँ प्रकरण । ३०५
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| न उद्विग्नम् | = न द्वेष है | न संतुष्टम् | = न संतोष को |
| च | = और | राजते | = प्राप्त होता है ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि जीवन्मुक्त का चित्त प्रकाश-रूप है, इसी वास्ते वह उद्वेग को नहीं प्राप्त होता है । क्योंकि उद्वेग का हेतु जो द्वैत है, वह उसके चित्त में नहीं रहा है, और संकल्प-विकल्प से भी शून्य है, इसी वास्ते उसका चित्त जगत् से निराश है, और संदेह से भी रहित है । क्योंकि संदेह का हेतु जो अज्ञान है, वह उसमें नहीं रहा ॥ ३० ॥
मूलम् ।
निध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते ।
निर्निमित्तमिदं किन्तु निध्यायति विचेष्टते ॥ ३१ ॥
पदच्छेदः ।
निध्यातुम्, चेष्टितुम्, वा, अपि, यत्, चित्तम्, न, प्रवर्तते, निर्निमित्तम्, इदम्, किन्तु, निध्यायति, विचेष्टते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| ज्ञानिनः | = ज्ञानी का | वा अपि | = अथवा |
| यत् | = जो | चेष्टितुम् | = चेष्टा करने को |
| चित्तम् | = चित्त है | न प्रवर्तते | = नहीं प्रवृत्त होता है |
| तत् | = वह | किन्तु | = परन्तु |
| निध्यातुम् | = $\Big{$ निष्क्रिय भाव में स्थित होने को | इदम् | = वह चित्त |
| निर्निमित्तम् | = संकल्प-रहित |