भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

३०६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

निध्यायति=निश्चल स्थित होता है च=और | विचेष्टते= { नाना प्रकार की चेष्टा को करता है

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि जिस ज्ञानी का चित्त संकल्प-विकल्परूपी चेष्टा करने में प्रवृत्त नहीं होता है, किन्तु वह चित्त के निश्चल और शुद्ध होने से अपने स्वरूप में स्थिर होता है ॥ ३१ ॥

मूलम् ।

तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम् । अथवाऽऽयातिसङ्कोचनमूढः कोऽपि मूढवत् ॥ ३२ ॥

पदच्छेदः ।

तत्त्वम्, यथार्थम्, आकर्ण्य, मन्दः, प्राप्नोति, मूढताम् अथवा, आयाति, सङ्कोचम्, अमूढः, कः, अपि, मूढवत् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
मन्दः=अज्ञानीआयाति=प्राप्त होता है
यथार्थम्तत्त्वम्= { तत्त्व पदार्थ अर्थात् उपनिषदादिकों को=और<br>तथा एव=वैसा ही
आकर्ण्य=सुन करकः अपि=और कोई
मूढताम्= { मूढ़ता अर्थात् संशय-विपर्यय कोअमूढः=ज्ञानी<br>मूढवत्=अज्ञानी की तरह
प्राप्नोति=प्राप्त होता हैमूढताम्= { संशय-विपर्यय अर्थात् व्यवहार को
अथवा=अथवा+वाह्यदृष्ट्या=वाह्य-दृष्टि से
सङ्कोचम्=चित्त की समाधि कोप्राप्नोति=प्राप्त होता है ॥