भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 405 में से

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पृष्ठ 314

अठारहवाँ प्रकरण । ३०७

भावार्थ ।

हे शिष्य ! मन्द पुरुष तत् और त्वं पद के कल्पित भेद को श्रुति से श्रवण करके भी संशय-विपर्यय के कारण मूढ़ता को ही प्राप्त होता है अथवा तत् और त्वं पद के अभेद अर्थ के जानने के लिये समाधि को लगाता है । परन्तु हजारों में कोई एक पुरुष अंतर से शान्त चित्तवाला होकर, बाहर से मूढ़वत् व्यवहार करता है ॥ ३२ ॥

मूलम् ।

एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम् । धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः ॥ ३३ ॥

पदच्छेदः ।

एकाग्रता, निरोधः, वा, मूढैः, अभ्यस्यते, भृशम्, धीराः, कृत्यम्, न, पश्यन्ति, सुप्तवत्, स्वपदे, स्थिताः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
एकाग्रता = चित्त की एकाग्रताकृत्यम् = पूर्व कृत्य को अर्थात् चित्त की एकाग्रता को और निरोधता को
वा = या
निरोधः = चित्त की निरोधतान पश्यन्ति = नहीं देखते हैं
मूढैः = अज्ञानियों करकेपरन्तु = परन्तु
भृशम् = अत्यन्तसुप्तवत् = सोए हुए पुरुष की तरह
अभ्यस्यते = अभ्यास किया जाता हैस्वपदे = अपने स्वरूप में
धीराः = ज्ञानी पुरुषस्थिताः = स्थित रहते हैं ॥
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