भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 405 में से

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३०८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

मुमुक्षुजन चित्त की एकाग्रता के लिये और विपरीत याचना की निवृत्ति के लिये यत्न करते हैं । परन्तु जो धीर पुरुष है, वह कुछ भी पूर्वोक्त कृत्य को नहीं देखता है । क्योंकि वह अपने स्वरूप में ही स्थित है ॥ ३३ ॥

मूलम् ।

अप्रयत्नात्प्रयत्नाद्वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिम् । तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः ॥ ३४ ॥

पदच्छेदः ।

अप्रयत्नात्, प्रयत्नात्, वा, मूढः, न, आप्नोति, निर्वृतिम्, तत्त्वनिश्चयमात्रेण, प्राज्ञः, भवति, निर्वृतः ।

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मूढः=अज्ञानी पुरुषप्राज्ञः=ज्ञानी पुरुष
अप्रयत्नात्=चित्त के निरोध सेतत्त्वनिश्चय-मात्रेण=केवल तत्त्व के निश्चय करने से ही
वा=अथवा
प्रयत्नात्=कर्मानुष्ठान सेनिर्वृतः=कृतार्थ
निर्वृतिम्=परम सुख कोभवति=होता है ॥
न आप्नोति=नहीं प्राप्त होता है

भावार्थ ।

जिस पुरुष को जीव-ब्रह्म की एकता का निश्चय नहीं है, वही पुरुष मूर्ख कहा जाता है। वह पुरुष चाहे चित्त की निरोध-रूपी समाधि को करे अथवा कर्मों के अनुष्ठान को करे, वह कदापि

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