अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
३०६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
निध्यायति=निश्चल स्थित होता है च=और | विचेष्टते= { नाना प्रकार की चेष्टा को करता है
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि जिस ज्ञानी का चित्त संकल्प-विकल्परूपी चेष्टा करने में प्रवृत्त नहीं होता है, किन्तु वह चित्त के निश्चल और शुद्ध होने से अपने स्वरूप में स्थिर होता है ॥ ३१ ॥
मूलम् ।
तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम् । अथवाऽऽयातिसङ्कोचनमूढः कोऽपि मूढवत् ॥ ३२ ॥
पदच्छेदः ।
तत्त्वम्, यथार्थम्, आकर्ण्य, मन्दः, प्राप्नोति, मूढताम् अथवा, आयाति, सङ्कोचम्, अमूढः, कः, अपि, मूढवत् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| मन्दः=अज्ञानी | आयाति=प्राप्त होता है |
| यथार्थम्तत्त्वम्= { तत्त्व पदार्थ अर्थात् उपनिषदादिकों को | च=और<br>तथा एव=वैसा ही |
| आकर्ण्य=सुन कर | कः अपि=और कोई |
| मूढताम्= { मूढ़ता अर्थात् संशय-विपर्यय को | अमूढः=ज्ञानी<br>मूढवत्=अज्ञानी की तरह |
| प्राप्नोति=प्राप्त होता है | मूढताम्= { संशय-विपर्यय अर्थात् व्यवहार को |
| अथवा=अथवा | +वाह्यदृष्ट्या=वाह्य-दृष्टि से |
| सङ्कोचम्=चित्त की समाधि को | प्राप्नोति=प्राप्त होता है ॥ |
अठारहवाँ प्रकरण । ३०७
भावार्थ ।
हे शिष्य ! मन्द पुरुष तत् और त्वं पद के कल्पित भेद को श्रुति से श्रवण करके भी संशय-विपर्यय के कारण मूढ़ता को ही प्राप्त होता है अथवा तत् और त्वं पद के अभेद अर्थ के जानने के लिये समाधि को लगाता है । परन्तु हजारों में कोई एक पुरुष अंतर से शान्त चित्तवाला होकर, बाहर से मूढ़वत् व्यवहार करता है ॥ ३२ ॥
मूलम् ।
एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम् । धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः ॥ ३३ ॥
पदच्छेदः ।
एकाग्रता, निरोधः, वा, मूढैः, अभ्यस्यते, भृशम्, धीराः, कृत्यम्, न, पश्यन्ति, सुप्तवत्, स्वपदे, स्थिताः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| एकाग्रता = चित्त की एकाग्रता | कृत्यम् = पूर्व कृत्य को अर्थात् चित्त की एकाग्रता को और निरोधता को |
| वा = या | |
| निरोधः = चित्त की निरोधता | न पश्यन्ति = नहीं देखते हैं |
| मूढैः = अज्ञानियों करके | परन्तु = परन्तु |
| भृशम् = अत्यन्त | सुप्तवत् = सोए हुए पुरुष की तरह |
| अभ्यस्यते = अभ्यास किया जाता है | स्वपदे = अपने स्वरूप में |
| धीराः = ज्ञानी पुरुष | स्थिताः = स्थित रहते हैं ॥ |
३०८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
मुमुक्षुजन चित्त की एकाग्रता के लिये और विपरीत याचना की निवृत्ति के लिये यत्न करते हैं । परन्तु जो धीर पुरुष है, वह कुछ भी पूर्वोक्त कृत्य को नहीं देखता है । क्योंकि वह अपने स्वरूप में ही स्थित है ॥ ३३ ॥
मूलम् ।
अप्रयत्नात्प्रयत्नाद्वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिम् । तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः ॥ ३४ ॥
पदच्छेदः ।
अप्रयत्नात्, प्रयत्नात्, वा, मूढः, न, आप्नोति, निर्वृतिम्, तत्त्वनिश्चयमात्रेण, प्राज्ञः, भवति, निर्वृतः ।
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मूढः= | अज्ञानी पुरुष | प्राज्ञः= | ज्ञानी पुरुष |
| अप्रयत्नात्= | चित्त के निरोध से | तत्त्वनिश्चय-मात्रेण= | केवल तत्त्व के निश्चय करने से ही |
| वा= | अथवा | ||
| प्रयत्नात्= | कर्मानुष्ठान से | निर्वृतः= | कृतार्थ |
| निर्वृतिम्= | परम सुख को | भवति= | होता है ॥ |
| न आप्नोति= | नहीं प्राप्त होता है |
भावार्थ ।
जिस पुरुष को जीव-ब्रह्म की एकता का निश्चय नहीं है, वही पुरुष मूर्ख कहा जाता है। वह पुरुष चाहे चित्त की निरोध-रूपी समाधि को करे अथवा कर्मों के अनुष्ठान को करे, वह कदापि
अठारहवाँ प्रकरण । ३०९
परम सुख को नहीं प्राप्त होता है। क्योंकि आनंद का हेतु जो आत्मा का अनुभव, वह उसको है नहीं और जो विद्वान् ज्ञानी है, वह न समाधि को और न कर्मों को करता है परन्तु निर्वृत्ति को अर्थात् नित्यसुख को प्राप्त होता है। क्योंकि उसको कुछ कर्तव्य बाकी नहीं रहा। गीता में भी कहा है—
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १ ॥
आत्मा में ही जिसकी रति है और अपने आत्मानंद करके ही जो तृप्त है, आत्मा में ही जो संतुष्ट है, बाहर के पदार्थों में जिसको तोष नहीं है, उसको कोई भी कर्तव्य बाकी नहीं रहा है ॥ ३४ ॥
मूलम् ।
शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपञ्चं निरामयम् ।
आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जना ॥ ३५ ॥
पदच्छेदः ।
शुद्धम्, बुद्धम्, प्रियम्, पूर्णम्, निष्प्रपञ्चम्, निरामयम्, आत्मानम्, तम्, न, जानन्ति, तत्र, अभ्यासपराः, जनाः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| तत्र = इस संसार में | पूर्णम् = पूर्ण |
| अभ्यासपरा = अभ्यासी | निष्प्रपञ्चम् = प्रपञ्च-रहित |
| जनाः = मनुष्य | च = और |
| तम् = उस | निरामयम् = दुःख-रहित |
| शुद्धम् = शुद्ध | आत्मानम् = आत्मा को |
| बुद्धम् = चैतन्य | न जानन्ति = नहीं जानते हैं ॥ |
| प्रियम् = प्रिय |
३१० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ । जगत् में कर्मादिकों के अभ्यासपरायण जो अज्ञानी पुरुष हैं, वे उस आत्मा को नहीं जानते हैं, जो शुद्ध है अर्थात् जो मायामल से रहित है, जो स्वप्रकाश है, जो परिपूर्ण है, जो प्रपञ्च से रहित है और जो दुःख के सम्बन्ध से भी रहित है ॥३५॥
मूलम् । नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा । धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः ॥ ३६ ॥
पदच्छेदः । न, आप्नोति, कर्मणा, मोक्षम्, विमूढः, अभ्यासरूपिणा, धन्यः, विज्ञानमात्रेण, मुक्तः, तिष्ठति, अविक्रियः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| विमूढः | =अज्ञानी | धन्यः | =भाग्यवान् |
| अभ्यासरूपिणा | =अभ्यासरूपी | पुरुषः | =पुरुष |
| कर्मणा | =कर्म से | विज्ञानमात्रेण | =केवल ज्ञान करके ही |
| मोक्षम् | =मोक्ष को | मुक्तः | =मुक्त हुआ |
| न आप्नोति | =नहीं प्राप्त होता है | तिष्ठति | = स्थित रहता है ॥ अर्थात् मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ |
| अविक्रियः | =क्रिया-रहित' |
भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो मूढ़ अज्ञानी जन है, वह कर्मों करके अर्थात् योगाभ्यास-रूप कर्मों करके भी मोक्ष को कदापि नहीं प्राप्त होते हैं ।
अठारहवाँ प्रकरण । ३११
तथाच—न कर्मणा न प्रजया न धनेन ।
कर्मों करके, प्रजा करके, धन करके, पुरुष मोक्ष को कदापि प्राप्त नहीं होता है, परन्तु जिसका अविद्या-मल दूर हो गया है, वह केवल विज्ञान-मात्र करके मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ॥ ३६ ॥
मूलम् ।
मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति । अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्म स्वरूपभाक् ॥ ३७ ॥
पदच्छेदः ।
मूढः, न, आप्नोति, तत्, ब्रह्म, यतः, भवितुम्, इच्छति, अनिच्छन्, अपि, धीरः, हि, परब्रह्मस्वरूपभाक् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| यतः=जिस कारण | न आप्नोति=नहीं प्राप्त होता है |
| मूढः=अज्ञानी | धीरः=ज्ञानी |
| ब्रह्म=ब्रह्म | हि=निश्चय करके |
| भवितुम्=होने को | अनिच्छन्नपि=नहीं चाहता हुआ भी |
| इच्छति=इच्छा करता है | $\left. परब्रह्मस्वरूप- भाक् \right}=परब्रह्म-स्वरूप का भजनेवाला |
| ततः=उसी कारण | |
| सः=वह | भवति=होता है ॥ |
| तत्=उसको अर्थात् ब्रह्म को |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! अज्ञानी मूढ़ चित्त के निरोध करने से ब्रह्म-रूप होने की इच्छा करता है, इसी
३१२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
वास्ते वह ब्रह्म को नहीं प्राप्त होता है । और जिस धीर ने अपने को ज्ञानी निश्चय कर लिया है, वह मोक्ष की नहीं इच्छा करता हुआ भी मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ३७ ॥
मूलम् ।
निराधारा ग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः । एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः ॥ ३८ ॥
पदच्छेदः ।
निराधाराः, ग्रहव्यग्राः, मूढाः, संसारपोषकाः, एतस्य, अनर्थमूलस्य, मूलच्छेदः, कृतः, बुधैः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निराधाराः | =आधार-रहित | अनर्थमूलस्य | =अनर्थ-रूप मूलवाले |
| ग्रहव्यग्राः | =दुराग्रही | संसारस्य | =संसार के |
| मूढाः | =अज्ञान | मूलच्छेदः | =मूल का नाश |
| संसारपोषकाः | = { संसार के पोषण करनेवाले हैं | बुधैः | =ज्ञानियों करके |
| एतस्य | =इस | कृतः | =किया गया है ॥ |
भावार्थ ।
जो मूढ़ अज्ञानी है, उसका ऐसा ख्याल है कि मैं वेदान्त-शास्त्र और आत्मवित् गुरु के आधार के विना ही केवल चित्त के निरोध से ही मोक्ष को प्राप्त हो जाऊँगा, ऐसा दुराग्रही पुरुष संसार से छुड़ानेवाला जो ज्ञान है, उससे पराङ्मुख होता है, इस संसार के मूलाज्ञान को वह छेदन नहीं कर सकता है ॥ ३८ ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३१३
मूलम् ।
न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति । धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्यसर्वदा शान्तमानसः ॥ ३९ ॥
पदच्छेदः ।
न, शान्तिम्, लभते, मूढः, यतः, शमितुम्, इच्छति, धीरः, तत्त्वम्, विनिश्चित्य, सर्वदा, शान्तमानसः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| यतः=जिस कारण | न लभते=नहीं प्राप्त होता है |
| शमितुम्=शान्त होने को | धीरः=ज्ञानी |
| मूढः=अज्ञानी | तत्त्वम्=तत्त्व को |
| इच्छति=इच्छा करता है | विनिश्चित्य=निश्चय करके |
| ततः=इसी कारण | सर्वदा=सर्वदा |
| सः=वह | शान्तमानसः=शान्त मनवाला है ॥ |
| शान्तिम्=शान्ति को |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! मूढ़ अज्ञानी जिस हेतु चित्त के निरोध से शान्ति की इच्छा करता है, इसी वास्ते वह शान्ति को नहीं प्राप्त होता है । धीर जो है सो आत्मतत्त्व को निश्चय करके शान्ति की इच्छा नहीं करता है, इसी लिये शान्ति को प्राप्त होता है ॥ ३९ ॥
मूलम् ।
क्वात्मनो दर्शनं तस्य यद्दृष्टमवलम्बते । धीरास्तंतं पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम् ॥ ४० ॥
३१४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
क्व, आत्मनः, दर्शनम्, तस्य, यत्, दृष्टम्, अवलम्बते, धीराः, तम्, तम्, न, पश्यन्ति, पश्यन्ति, आत्मानम्, अव्ययम् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| तस्य=उसको | धीराः=ज्ञानी |
| आत्मनः=आत्मा का | तम् तम्=उस |
| दर्शनम्=दर्शन | दृष्टम्=दृष्ट को |
| क्व=कहाँ है | न पश्यन्ति=नहीं देखते हैं |
| यत्=जो | परन्तु=परन्तु |
| दृष्टम्=दृष्ट को | अव्ययम्=अविनाशी |
| अवलम्बते=अवलम्बन करता है | आत्मानम्=आत्मा को |
| पश्यन्ति=देखते हैं ॥ |
भावार्थ ।
जो अज्ञानी पुरुष है, वह प्रत्यक्ष प्रमाणों करके ही जाने हुए पदार्थों को सत्य-रूप करके मानता है, इसी कारण उसको आत्म-दर्शन कदापि नहीं प्राप्त होता है। और जो ज्ञानी है, वह देखते हुए पदार्थों को नहीं देखता है। किन्तु उनके अन्तर्गत कारण-शक्ति सर्वत्र चिद्रूप आत्मा को ही देखता है, इसी कारण वह परमात्मा में सदा लीन रहता है, और कार्य-रूपी बाह्य पदार्थ उसको कोई भी दिखाई नहीं देता है ॥ ४० ॥
मूलम् ।
क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै । स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदाऽसावकृत्रिमः ॥ ४१ ॥
अठारहवां प्रकरण । ३१५
पदच्छेदः । क्व, निरोधः, विमूढस्य, यः, निर्बन्धम्, करोति, वै, स्वरामस्य, एव, धीरस्य, सर्वदा, असौ, अकृत्रिमः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यः | =जो | स्वरामस्य | =आत्माराम |
| निर्बन्धम् | =चित्त के निरोध को | धीरस्य | =ज्ञानी को |
| वै | =हठ करके | सर्वदां | =सदैव |
| करोति | =करता है | एव | =निश्चय करके |
| तस्य | =उस | असौ | =यह |
| विमूढस्य | =अज्ञानी को | चित्तनिरोधः | =चित्त का निरोध |
| क्व | =कहाँ | अकृत्रिमः | =स्वाभाविक है ॥ |
| निरोधः | =चित्त का निरोध है |
भावार्थ । जो अज्ञानी पुरुष शुष्कचित्त के निरोध में हठ करता है, उसका चित्त कभी निरोध को नहीं प्राप्त होता है । अज्ञानी ही चित्त के निरोध के लिये समाधि लगाता है । जब वह समाधि से उत्थान करता है, तब फिर उसका चित्त संसार के पदार्थों में फैल जाता है । और जो आत्मा में स्मरण करनेवाला योगी है, जिसका चित्त निश्चल है, उसका चित्त सर्वदा आत्मा में ही निरुद्ध रहता है, इसी कारण सर्वदा उसकी समाधि बनी रहती है ॥ ४१ ॥
मूलम् । भावस्य भावकः कश्चिन्न किञ्चिद्भावकोऽपरः । उभयाऽभावकः कश्चिदेवमेव निराकुलः ॥ ४२ ॥
३१६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
भावस्य, भावकः, कश्चित्, न, किञ्चित्, भावकः, अपरः, उभयाऽभावकः, कश्चित्, एवम्, एव, निराकुलः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| कश्चित्=कोई | भावकः=माननेवाला है |
| भावस्य=भाव का | एवम् एव=वैसा ही |
| भावकः=माननेवाला है | कश्चित्=कोई |
| अपरः=और कोई | $\left.\begin{aligned} उभया- \ ऽभावकः \end{aligned} \right} =\begin{aligned} &दोनों अर्थात् भाव \ &और अभाव का नहीं \ &माननेवाला \end{aligned}$ |
| किञ्चित्=कुछ भी | |
| न=नहीं है | |
| एवम्=ऐसा | निराकुलः=स्वस्थ चित्त है ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! कोई एक नैयायिक ऐसा मानता है कि भाव-रूप प्रपञ्च परमार्थ से सत्य है । और कोई शून्य वादी कहता है कि सब प्रपञ्च शून्य-रूप है, क्योंकि शून्य ही से उसकी उत्पत्ति होती है । और हजारों में से कोई एक आत्मा का अनुभव करनेवाला होता है । वह भाव और अभाव दोनों की भावना का त्याग करके और स्वस्थचित्त होकर अपने आत्मानन्द में ही सदा मग्न रहता है ॥ ४२ ॥
मूलम् ।
शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः । न तु जानन्ति संमोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः ॥ ४३ ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३१७
पदच्छेदः । शुद्धम्, अद्वयम्, आत्मानम्, भावयन्ति, कुबुद्धयः, न, तु, जानन्ति, संमोहात्, यावज्जीवम्, अनिवृत्ताः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कुबुद्धयः | दुर्बुद्धि पुरुष | संमोहात् | अज्ञानता के कारण |
| शुद्धम् | शुद्ध | न जानन्ति | नहीं जानते हैं |
| अद्वयम् | अद्वैत | अतः | इसलिये |
| आत्मानम् | आत्मा को | यावज्जीवम् | जब तक उनका जीवन है |
| भावयन्ति | भावना करते हैं | अनिवृत्ताः | संतोष-रहित हैं ॥ |
| तु | परन्तु |
भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! अज्ञानी मूढ़ शुद्ध निर्मल द्वैत से रहित व्यापक आत्मा का अनुभव नहीं करते हैं, क्योंकि उनका मोह सांसारिक पदार्थों से निवृत्त नहीं हुआ है । इसी कारण उनको आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता है । जब तक वे जीते हैं, सन्तोष को कदापि नहीं प्राप्त होते हैं । आत्मा के साक्षात्कार होने के विना सन्तोष की प्राप्ति नहीं हो सकती है ॥ ४३ ॥
मूलम् । मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते । निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा ॥ ४४ ॥
पदच्छेदः । मुमुक्षोः, बुद्धिः, आलम्बम्, अन्तरेण, न, विद्यते, निरा- लम्बा, एव, निष्कामा, बुद्धिः, मुक्तस्य, सर्वदा ॥
३१८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मुमुक्षोः = | मुमुक्षु पुरुष की | सर्वदा = | सब काल में |
| बुद्धिः = | बुद्धि | निष्कामा = | कामना-रहित |
| आलम्बम् अन्तरेण = | आलम्ब के बिना | च = | और |
| न विद्यते = | नहीं रहती है | निरालम्बा = | आश्रय-रहित |
| मुक्तस्य = | मुक्त पुरुष की | एव = | निश्चय करके |
| बुद्धिः = | बुद्धि | विद्यते = | रहती है ॥ |
भावार्थ ।
जिसको आत्मा का साक्षात्कार नहीं हुआ है, उसकी बुद्धि सांसारिक विषय का आलम्बन करती है । और जो निष्काम जीवन्मुक्त है, उसकी बुद्धि आत्मा के आश्रय रहती है । आत्मा के अचल होने से वह बुद्धि भी सदैव स्थिर रहती है ॥ ४४ ॥
मूलम् ।
विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः ।
विशन्ति झटिति क्रोडन्निरोधैकाग्रयसिद्धये ॥ ४५ ॥
पदच्छेदः ।
विषयद्वीपिनः, वीक्ष्य, चकिताः, शरणार्थिनः, विशन्ति, झटिति, क्रोडम्, निरोधैकाग्रयसिद्धये ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| विषयद्वीपिनः = | विषय-रूपी व्याघ्र को | शरणार्थिनः = | अपने शरीर की रक्षा करनेवाले मूढ़ पुरुष |
| वीक्ष्य = | देख करके | ||
| चकिताः = | डरे हुए |
अठारहवाँ प्रकरण । ३१९
निरोधै- ⎧ चित्त की निरोधता ⎹ झटिति=शीघ्र काग्र्य= ⎨ और एकाग्रता की ⎹ क्रोडम्=पहाड़ की गुहा में सिद्धये ⎩ सिद्धि के लिये ⎹ विशन्ति=प्रवेश करते हैं ।।
भावार्थ । मूढ़ मुमुक्षु विषय-रूपी व्याघ्रों को देख करके भय को प्राप्त होता और चित्त की वृत्ति को एकाग्र करने के लिये पहाड़ी कन्दरा में प्रवेश कर जाता है, परन्तु उसका कार्य सिद्ध नहीं होता है, उसकी अन्तर्वृत्ति फैलती जाती है और वह हर दिन दुःखी होता जाता है, शान्ति उसको लेश-मात्र भी नहीं होती है और जो ज्ञानी जीवन्मुक्त है, वह विषय-रूपी व्याघ्र को इन्द्रजाल-जन्य पदार्थों की तरह देखकर उनसे भय नहीं खाता है ॥ ४५ ॥
मूलम् । निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः । पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ ४६ ॥
पदच्छेदः । निर्वासनम्, हरिम्, दृष्ट्वा, तूष्णीम्, विषयदन्तिनः, पलायन्ते, न, शक्ताः, ते, सेवन्ते, कृतचाटवः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| निर्वासनम्=वासना-रहित | न शक्ताः=असमर्थ |
| पुरुषम्=पुरुष-रूपी | विषयदन्तिनः=विषय-रूपी हाथी |
| हरिम्=सिंह को | तूष्णीम्=चुपचाप हुए |
| दृष्ट्वा=देखकर | पलायन्ते=भागते हैं |
३२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| च = और<br>ते = वे<br>कृतचाटवः = प्रियवादी अर्थात् संसारी पुरुष<br>ईश्वराकृष्टाः = ईश्वर करके प्रेरित हुए | $\left. तन्निर्वासनम् पुरुषम् \right}=$ उस वासना-रहित पुरुष को<br>स्वयम् = स्वतः<br>आगत्य = आकर<br>सेवन्ते = सेवन करते हैं ॥ |
भावार्थ ।
क्योंकि वासना-रहित पुरुष-रूपी सिंह को देखकर, विषय-रूपी हस्ती असमर्थ होकर भाग जाता है । और ऐसे ही नरसिंह की प्रतिष्ठा और सेवा इतर पुरुष ईश्वर करके प्रेरित हुए करते हैं ॥ ४६ ॥
मूलम् ।
न मुक्तिकारिकान्धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः ।
पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ ४७ ॥
पदच्छेदः ।
न, मुक्तिकारिकाम्, धत्ते, निःशङ्कः, युक्तमानसः, पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, आस्ते, यथासुखम् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| निःशङ्कः = शङ्का-रहित<br>च = और<br>युक्तमानसः = निश्चल मनवाला<br>ज्ञानी = ज्ञानी<br>$\left. मुक्तिका- रिकाम् \right}=$ यमनियमादि योग- क्रिया को | आग्रहात् = आग्रह से<br>न धत्ते = नहीं धारण करता है<br>किन्तु = परन्तु<br>पश्यन् = देखता हुआ<br>शृण्वन् = सुनता हुआ |
अठारहवाँ प्रकरण । ३२१
| स्पृशन्=स्पर्श करता हुआ | सः=वह |
| जिघ्रन्=सूँघता हुआ | यथासुखम्=सुख-पूर्वक |
| अश्नन्=खाता हुआ | आस्ते=रहता है ॥ |
भावार्थ ।
दूर हो गए हैं संशय जिसके, निश्चल है मन जिसका, ऐसा जो जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुष है, वह यम-नियमादिक क्रिया को भी हठ से नहीं करता है, क्योंकि उसको कर्तृत्वा-ध्यास नहीं है। वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ अर्थात् लोकदृष्टि करके सर्वक्रिया को करता हुआ, अपने आत्मानन्द में ही स्थिर रहता है ॥ ४७ ॥
मूलम् ।
वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः ।
नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति ॥ ४८ ॥
पदच्छेदः ।
वस्तुश्रवणमात्रेण, शुद्धबुद्धि, निराकुलः, न, एव, आचारम्, अनाचारम्, औदास्यम्, वा, प्रपश्यति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| वस्तुश्रवण-मात्रेण = | यथार्थ वस्तु के श्रवण-मात्र से ही | न एव= | न |
| शुद्धबुद्धिः= | शुद्ध बुद्धिवाला | आचारम्= | आचार को |
| च= | और | वा= | और |
| निराकुलः= | स्वस्थ चित्तवाला पुरुष | औदास्यम्= | उदासीनता को |
| प्रपश्यति= | देखता है ॥ |
३२२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि चिदात्मा के श्रवण-मात्र से ही जिसकी शुद्ध अखण्डाकार बुद्धि उत्पन्न हुई है, वही अपने आत्मा के स्वरूप में स्थित है । वह न आचार को, न अनाचार को अर्थात् न शुभ, न अशुभकर्म को, न उनसे रहित होने की इच्छा को करता है । क्योंकि वह सदा अपने मन में मग्न रहता है ॥ ४८ ॥
मूलम् ।
यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजुः । शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत् ॥ ४९ ॥
पदच्छेदः ।
यदा, यत्, कर्तुम्, आयाति, तदा, तत्, कुरुते, ऋजुः, शुभम्, वा, अपि, अशुभम्, वा, अपि, तस्य, चेष्टा, हि, बालवत् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा | = जब | धीरः | = ज्ञानी |
| यत् | = जो कुछ | ऋजुः | = आग्रह-रहित |
| शुभम् | = शुभ | कुरुते | = करता है |
| वा अपि | = अथवा | हि | = क्योंकि |
| अशुभम् | = अशुभ | तस्य | = उसको |
| कर्तुम् | = करने को | चेष्टा | = व्यवहार |
| आयाति | = प्राप्त होता है | बालवत् | = बालवत् |
| तदा | = तब | भवति | = प्रतीत होता है ॥ |
| तत् | = उसको |
अठारहवाँ प्रकरण । ३२३
भावार्थ ।
जिस काल में वह ज्ञानी शुभ कर्म को अथवा अशुभ कर्म को करता है, वह प्रारब्ध के वश से, दैवगति से अकस्मात् करता है । शोभन, अशोभन बुद्धि करके वा हठ करके नहीं करता है । क्योंकि उसकी चेष्टा बालक की तरह प्रारब्ध के अधीन होती है, राग-द्वेष के अधीन नहीं होती है ॥ ४९ ॥
मूलम् ।
स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम् ।
स्वातन्त्र्यान्निर्वृ॑तिंगच्छेत्स्वातंत्र्यात्परमंपदम् ॥ ५० ॥
पदच्छेदः ।
स्वातन्त्र्यात्, सुखम्, आप्नोति, स्वातन्त्र्यात्, लभते, परम्, स्वातन्त्र्यात्, निर्वृतिम्, गच्छेत्, स्वातन्त्र्यात्, परमम्, पदम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वातन्त्र्यात् = | स्वतन्त्रता से | स्वातन्त्र्यात् = | स्वतन्त्रता से |
| सुखम् = | सुख को | निर्वृतिम् = | नित्य सुख को |
| ज्ञानी = | ज्ञानी | गच्छेत् = | प्राप्त होता है |
| आप्नोति = | प्राप्त होता है | स्वातन्त्र्यात् = | स्वतन्त्रता से |
| स्वातन्त्र्यात् = | स्वतन्त्रता से | परमं पदम् = | परमपद को अर्थात् अपने स्वरूप को |
| परम् = | ज्ञान को | ||
| लभते = | प्राप्त होता है | आप्नोति = | प्राप्त होता है ॥ |
३२४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
स्वतन्त्रता से अर्थात् राग-द्वेष की अधीनता से रहित पुरुष सुख को प्राप्त होता है और उसी स्वतन्त्रता करके पुरुष आत्म-ज्ञान को भी प्राप्त होता है, और स्वतन्त्रता से ही पुरुष नित्य सुख को भी प्राप्त होता है, और स्वतन्त्रता करके ही पुरुष परम शान्ति को भी प्राप्त होता है ॥ ५० ॥
मूलम् ।
अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा ।
तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः ॥ ५१ ॥
पदच्छेदः ।
अकर्तृत्वम्, अभोक्तृत्वम्, स्वात्मनः, मन्यते, यदा, तदा, क्षीणः, भवन्ति, एव, समस्तः, चित्तवृत्तयः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा= | जब | तदा= | तब |
| +पुरुषः= | पुरुष | +तस्य= | उसकी |
| स्वात्मनः= | अपने आत्मा के | समस्ताः= | सम्पूर्ण |
| अकर्तृत्वम्= | अकर्तापने को | चित्तवृत्तयः= | चित्त की वृत्तियाँ |
| अभोक्तृत्वम्= | अभोक्तापने को | एव= | निश्चय करके |
| मन्यते= | मानता है | क्षीणाः= | नाश |
| भवन्ति= | होती हैं ॥ |
अठारहवां प्रकरण । ३२५
भावार्थ ।
जिस काल में विद्वान् अपने को अकर्त्ता और अभोक्ता मानता है, उसी काल में चित्त की सम्पूर्ण वृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं अर्थात् जब वह ऐसा निश्चय करता है कि इस कर्म को मैं करूँगा, और उसका फल मुझे प्राप्त होगा, तब उसके चित्त की अनेक वृत्तियाँ उदित होती हैं, और वह दुःखी होता है । परन्तु जब अपने को अकर्त्ता, अभोक्ता निश्चय करता है, तब उसके चित्त की सम्पूर्ण वृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती हैं, और वह शान्ति को प्राप्त होता है ।
प्रश्न—केवल अकर्त्ता, अभोक्ता निश्चय करने से ही यदि चित्त की वृत्तियों का अभाव हो जावे, और वह जीवन्मुक्त हो जावे, तो बद्धज्ञानियों के चित्त की वृत्तियों का अभाव होना चाहिए और उनका भी जीवन्मुक्त कहना चाहिए, पर ऐसा नहीं देखते हैं । क्योंकि बद्धज्ञानियों के चित्त की वृत्तियां विषयों में लगी रहती हैं, और उनको लोग जीवन्मुक्त भी नहीं कहते हैं । इसी से सिद्ध होता है कि केवल अकर्त्ता, अभोक्ता मान लेने से ही वृत्तियों का निरोध नहीं होता है ।
उत्तर—उन बद्धज्ञानियों का जो कथन है कि हम अकर्त्ता हैं, हम अभोक्ता हैं, सो सब मिथ्या है । क्योंकि उनका अभ्यास बना है, उनकी विषयाकार वृत्तियाँ उदय होती हैं, और न उनका निश्चय परिपक्व है । यदि निश्चय परिपक्व