अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 329, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 329
३२२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि चिदात्मा के श्रवण-मात्र से ही जिसकी शुद्ध अखण्डाकार बुद्धि उत्पन्न हुई है, वही अपने आत्मा के स्वरूप में स्थित है । वह न आचार को, न अनाचार को अर्थात् न शुभ, न अशुभकर्म को, न उनसे रहित होने की इच्छा को करता है । क्योंकि वह सदा अपने मन में मग्न रहता है ॥ ४८ ॥
मूलम् ।
यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजुः । शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत् ॥ ४९ ॥
पदच्छेदः ।
यदा, यत्, कर्तुम्, आयाति, तदा, तत्, कुरुते, ऋजुः, शुभम्, वा, अपि, अशुभम्, वा, अपि, तस्य, चेष्टा, हि, बालवत् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा | = जब | धीरः | = ज्ञानी |
| यत् | = जो कुछ | ऋजुः | = आग्रह-रहित |
| शुभम् | = शुभ | कुरुते | = करता है |
| वा अपि | = अथवा | हि | = क्योंकि |
| अशुभम् | = अशुभ | तस्य | = उसको |
| कर्तुम् | = करने को | चेष्टा | = व्यवहार |
| आयाति | = प्राप्त होता है | बालवत् | = बालवत् |
| तदा | = तब | भवति | = प्रतीत होता है ॥ |
| तत् | = उसको |