भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 330, कुल 405 में से

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पृष्ठ 330

अठारहवाँ प्रकरण । ३२३

भावार्थ ।

जिस काल में वह ज्ञानी शुभ कर्म को अथवा अशुभ कर्म को करता है, वह प्रारब्ध के वश से, दैवगति से अकस्मात् करता है । शोभन, अशोभन बुद्धि करके वा हठ करके नहीं करता है । क्योंकि उसकी चेष्टा बालक की तरह प्रारब्ध के अधीन होती है, राग-द्वेष के अधीन नहीं होती है ॥ ४९ ॥

मूलम् ।

स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम् ।
स्वातन्त्र्यान्निर्वृ॑तिंगच्छेत्स्वातंत्र्यात्परमंपदम् ॥ ५० ॥

पदच्छेदः ।

स्वातन्त्र्यात्, सुखम्, आप्नोति, स्वातन्त्र्यात्, लभते, परम्, स्वातन्त्र्यात्, निर्वृतिम्, गच्छेत्, स्वातन्त्र्यात्, परमम्, पदम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
स्वातन्त्र्यात् =स्वतन्त्रता सेस्वातन्त्र्यात् =स्वतन्त्रता से
सुखम् =सुख कोनिर्वृतिम् =नित्य सुख को
ज्ञानी =ज्ञानीगच्छेत् =प्राप्त होता है
आप्नोति =प्राप्त होता हैस्वातन्त्र्यात् =स्वतन्त्रता से
स्वातन्त्र्यात् =स्वतन्त्रता सेपरमं पदम् =परमपद को अर्थात् अपने स्वरूप को
परम् =ज्ञान को
लभते =प्राप्त होता हैआप्नोति =प्राप्त होता है ॥
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