अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३२४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
स्वतन्त्रता से अर्थात् राग-द्वेष की अधीनता से रहित पुरुष सुख को प्राप्त होता है और उसी स्वतन्त्रता करके पुरुष आत्म-ज्ञान को भी प्राप्त होता है, और स्वतन्त्रता से ही पुरुष नित्य सुख को भी प्राप्त होता है, और स्वतन्त्रता करके ही पुरुष परम शान्ति को भी प्राप्त होता है ॥ ५० ॥
मूलम् ।
अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा ।
तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः ॥ ५१ ॥
पदच्छेदः ।
अकर्तृत्वम्, अभोक्तृत्वम्, स्वात्मनः, मन्यते, यदा, तदा, क्षीणः, भवन्ति, एव, समस्तः, चित्तवृत्तयः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा= | जब | तदा= | तब |
| +पुरुषः= | पुरुष | +तस्य= | उसकी |
| स्वात्मनः= | अपने आत्मा के | समस्ताः= | सम्पूर्ण |
| अकर्तृत्वम्= | अकर्तापने को | चित्तवृत्तयः= | चित्त की वृत्तियाँ |
| अभोक्तृत्वम्= | अभोक्तापने को | एव= | निश्चय करके |
| मन्यते= | मानता है | क्षीणाः= | नाश |
| भवन्ति= | होती हैं ॥ |