भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 331, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 331

३२४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

स्वतन्त्रता से अर्थात् राग-द्वेष की अधीनता से रहित पुरुष सुख को प्राप्त होता है और उसी स्वतन्त्रता करके पुरुष आत्म-ज्ञान को भी प्राप्त होता है, और स्वतन्त्रता से ही पुरुष नित्य सुख को भी प्राप्त होता है, और स्वतन्त्रता करके ही पुरुष परम शान्ति को भी प्राप्त होता है ॥ ५० ॥

मूलम् ।

अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा ।
तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः ॥ ५१ ॥

पदच्छेदः ।

अकर्तृत्वम्, अभोक्तृत्वम्, स्वात्मनः, मन्यते, यदा, तदा, क्षीणः, भवन्ति, एव, समस्तः, चित्तवृत्तयः ॥


अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यदा=जबतदा=तब
+पुरुषः=पुरुष+तस्य=उसकी
स्वात्मनः=अपने आत्मा केसमस्ताः=सम्पूर्ण
अकर्तृत्वम्=अकर्तापने कोचित्तवृत्तयः=चित्त की वृत्तियाँ
अभोक्तृत्वम्=अभोक्तापने कोएव=निश्चय करके
मन्यते=मानता हैक्षीणाः=नाश
भवन्ति=होती हैं ॥