अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 328, कुल 405 में से
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अठारहवाँ प्रकरण । ३२१
| स्पृशन्=स्पर्श करता हुआ | सः=वह |
| जिघ्रन्=सूँघता हुआ | यथासुखम्=सुख-पूर्वक |
| अश्नन्=खाता हुआ | आस्ते=रहता है ॥ |
भावार्थ ।
दूर हो गए हैं संशय जिसके, निश्चल है मन जिसका, ऐसा जो जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुष है, वह यम-नियमादिक क्रिया को भी हठ से नहीं करता है, क्योंकि उसको कर्तृत्वा-ध्यास नहीं है। वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ अर्थात् लोकदृष्टि करके सर्वक्रिया को करता हुआ, अपने आत्मानन्द में ही स्थिर रहता है ॥ ४७ ॥
मूलम् ।
वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः ।
नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति ॥ ४८ ॥
पदच्छेदः ।
वस्तुश्रवणमात्रेण, शुद्धबुद्धि, निराकुलः, न, एव, आचारम्, अनाचारम्, औदास्यम्, वा, प्रपश्यति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| वस्तुश्रवण-मात्रेण = | यथार्थ वस्तु के श्रवण-मात्र से ही | न एव= | न |
| शुद्धबुद्धिः= | शुद्ध बुद्धिवाला | आचारम्= | आचार को |
| च= | और | वा= | और |
| निराकुलः= | स्वस्थ चित्तवाला पुरुष | औदास्यम्= | उदासीनता को |
| प्रपश्यति= | देखता है ॥ |