अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
अठारहवाँ प्रकरण । ३२१
| स्पृशन्=स्पर्श करता हुआ | सः=वह |
| जिघ्रन्=सूँघता हुआ | यथासुखम्=सुख-पूर्वक |
| अश्नन्=खाता हुआ | आस्ते=रहता है ॥ |
भावार्थ ।
दूर हो गए हैं संशय जिसके, निश्चल है मन जिसका, ऐसा जो जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुष है, वह यम-नियमादिक क्रिया को भी हठ से नहीं करता है, क्योंकि उसको कर्तृत्वा-ध्यास नहीं है। वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ अर्थात् लोकदृष्टि करके सर्वक्रिया को करता हुआ, अपने आत्मानन्द में ही स्थिर रहता है ॥ ४७ ॥
मूलम् ।
वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः ।
नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति ॥ ४८ ॥
पदच्छेदः ।
वस्तुश्रवणमात्रेण, शुद्धबुद्धि, निराकुलः, न, एव, आचारम्, अनाचारम्, औदास्यम्, वा, प्रपश्यति ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| वस्तुश्रवण-मात्रेण = | यथार्थ वस्तु के श्रवण-मात्र से ही | न एव= | न |
| शुद्धबुद्धिः= | शुद्ध बुद्धिवाला | आचारम्= | आचार को |
| च= | और | वा= | और |
| निराकुलः= | स्वस्थ चित्तवाला पुरुष | औदास्यम्= | उदासीनता को |
| प्रपश्यति= | देखता है ॥ |
३२२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि चिदात्मा के श्रवण-मात्र से ही जिसकी शुद्ध अखण्डाकार बुद्धि उत्पन्न हुई है, वही अपने आत्मा के स्वरूप में स्थित है । वह न आचार को, न अनाचार को अर्थात् न शुभ, न अशुभकर्म को, न उनसे रहित होने की इच्छा को करता है । क्योंकि वह सदा अपने मन में मग्न रहता है ॥ ४८ ॥
मूलम् ।
यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजुः । शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत् ॥ ४९ ॥
पदच्छेदः ।
यदा, यत्, कर्तुम्, आयाति, तदा, तत्, कुरुते, ऋजुः, शुभम्, वा, अपि, अशुभम्, वा, अपि, तस्य, चेष्टा, हि, बालवत् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा | = जब | धीरः | = ज्ञानी |
| यत् | = जो कुछ | ऋजुः | = आग्रह-रहित |
| शुभम् | = शुभ | कुरुते | = करता है |
| वा अपि | = अथवा | हि | = क्योंकि |
| अशुभम् | = अशुभ | तस्य | = उसको |
| कर्तुम् | = करने को | चेष्टा | = व्यवहार |
| आयाति | = प्राप्त होता है | बालवत् | = बालवत् |
| तदा | = तब | भवति | = प्रतीत होता है ॥ |
| तत् | = उसको |
अठारहवाँ प्रकरण । ३२३
भावार्थ ।
जिस काल में वह ज्ञानी शुभ कर्म को अथवा अशुभ कर्म को करता है, वह प्रारब्ध के वश से, दैवगति से अकस्मात् करता है । शोभन, अशोभन बुद्धि करके वा हठ करके नहीं करता है । क्योंकि उसकी चेष्टा बालक की तरह प्रारब्ध के अधीन होती है, राग-द्वेष के अधीन नहीं होती है ॥ ४९ ॥
मूलम् ।
स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम् ।
स्वातन्त्र्यान्निर्वृ॑तिंगच्छेत्स्वातंत्र्यात्परमंपदम् ॥ ५० ॥
पदच्छेदः ।
स्वातन्त्र्यात्, सुखम्, आप्नोति, स्वातन्त्र्यात्, लभते, परम्, स्वातन्त्र्यात्, निर्वृतिम्, गच्छेत्, स्वातन्त्र्यात्, परमम्, पदम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| स्वातन्त्र्यात् = | स्वतन्त्रता से | स्वातन्त्र्यात् = | स्वतन्त्रता से |
| सुखम् = | सुख को | निर्वृतिम् = | नित्य सुख को |
| ज्ञानी = | ज्ञानी | गच्छेत् = | प्राप्त होता है |
| आप्नोति = | प्राप्त होता है | स्वातन्त्र्यात् = | स्वतन्त्रता से |
| स्वातन्त्र्यात् = | स्वतन्त्रता से | परमं पदम् = | परमपद को अर्थात् अपने स्वरूप को |
| परम् = | ज्ञान को | ||
| लभते = | प्राप्त होता है | आप्नोति = | प्राप्त होता है ॥ |
३२४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
स्वतन्त्रता से अर्थात् राग-द्वेष की अधीनता से रहित पुरुष सुख को प्राप्त होता है और उसी स्वतन्त्रता करके पुरुष आत्म-ज्ञान को भी प्राप्त होता है, और स्वतन्त्रता से ही पुरुष नित्य सुख को भी प्राप्त होता है, और स्वतन्त्रता करके ही पुरुष परम शान्ति को भी प्राप्त होता है ॥ ५० ॥
मूलम् ।
अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा ।
तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः ॥ ५१ ॥
पदच्छेदः ।
अकर्तृत्वम्, अभोक्तृत्वम्, स्वात्मनः, मन्यते, यदा, तदा, क्षीणः, भवन्ति, एव, समस्तः, चित्तवृत्तयः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यदा= | जब | तदा= | तब |
| +पुरुषः= | पुरुष | +तस्य= | उसकी |
| स्वात्मनः= | अपने आत्मा के | समस्ताः= | सम्पूर्ण |
| अकर्तृत्वम्= | अकर्तापने को | चित्तवृत्तयः= | चित्त की वृत्तियाँ |
| अभोक्तृत्वम्= | अभोक्तापने को | एव= | निश्चय करके |
| मन्यते= | मानता है | क्षीणाः= | नाश |
| भवन्ति= | होती हैं ॥ |
अठारहवां प्रकरण । ३२५
भावार्थ ।
जिस काल में विद्वान् अपने को अकर्त्ता और अभोक्ता मानता है, उसी काल में चित्त की सम्पूर्ण वृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं अर्थात् जब वह ऐसा निश्चय करता है कि इस कर्म को मैं करूँगा, और उसका फल मुझे प्राप्त होगा, तब उसके चित्त की अनेक वृत्तियाँ उदित होती हैं, और वह दुःखी होता है । परन्तु जब अपने को अकर्त्ता, अभोक्ता निश्चय करता है, तब उसके चित्त की सम्पूर्ण वृत्तियाँ निरुद्ध हो जाती हैं, और वह शान्ति को प्राप्त होता है ।
प्रश्न—केवल अकर्त्ता, अभोक्ता निश्चय करने से ही यदि चित्त की वृत्तियों का अभाव हो जावे, और वह जीवन्मुक्त हो जावे, तो बद्धज्ञानियों के चित्त की वृत्तियों का अभाव होना चाहिए और उनका भी जीवन्मुक्त कहना चाहिए, पर ऐसा नहीं देखते हैं । क्योंकि बद्धज्ञानियों के चित्त की वृत्तियां विषयों में लगी रहती हैं, और उनको लोग जीवन्मुक्त भी नहीं कहते हैं । इसी से सिद्ध होता है कि केवल अकर्त्ता, अभोक्ता मान लेने से ही वृत्तियों का निरोध नहीं होता है ।
उत्तर—उन बद्धज्ञानियों का जो कथन है कि हम अकर्त्ता हैं, हम अभोक्ता हैं, सो सब मिथ्या है । क्योंकि उनका अभ्यास बना है, उनकी विषयाकार वृत्तियाँ उदय होती हैं, और न उनका निश्चय परिपक्व है । यदि निश्चय परिपक्व
३२६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
होता, तो कदापि उनकी वृत्तियाँ विषयाकार उत्पन्न न होतीं।
दृष्टान्त।
जैसे हिन्दू-धर्म के लिए गोमांस अति निषिद्ध है, अतः किसी हिन्दू का मन गोमांस की तरफ स्वप्न में नहीं जाता है, वैसे ही जिस विद्वान् ज्ञानी का यह परिपक्व निश्चय है कि मैं अकर्त्ता हूँ, अभोक्ता हूँ, उसका मन कभी स्वप्न में भी विषयों की तरफ नहीं जाता है, और उसकी विषयाकार वृत्ति कदापि नहीं उदय होती है, और जिसका निश्चय परिपक्व नहीं है अर्थात् जो बद्धज्ञानी है, वह लोगों को सुनाता है कि मैं अकर्त्ता हूँ, अभोक्ता हूँ, परन्तु भीतर से उसकी विषयों की तरफ बिलार की तरह दृष्टि रहती है। जैसे बिलार तब तक आँखों को मूँदे रहती है, जब तक मूसे को नहीं देखती है। जब मूसे को देखती है, तुरन्त झपटकर खा जाती है, वैसे ही बद्धज्ञानी भी तब तक ही अकर्त्ता, अभोक्ता बना रहता है, जब तक विषय-रूपी मूस उनको नहीं दीखता है। जब विषय-रूपी मूस उसके सामने आता है, तुरंत ही वह कर्त्ता और भोक्ता होकर उसको खा जाता है।
एक निर्मल संत पञ्जाब देश के किसी ग्राम में एक युवती स्त्री को 'विचार-सागर' पढ़ाते थे। पढ़ाते-पढ़ाते उस पर उनका मन चलायमान हो गया। तब उसकी जाँघों पर हाथ फेरने लगे। उस स्त्री ने कहा कि महाराज अभी तो आपने मुझे
अठारहवाँ प्रकरण । ३२७
पढ़ाया है कि भोगों को विष के तुल्य जानकर त्याग करना चाहिए और आप ही अब मेरी जाँघों पर हाथ फेरते हैं, यह क्या बात है। तब उन महात्मा ने कहा कि हम तुम्हारी परीक्षा करते हैं। तुमने समग्र 'विचार-सागर' पढ़ लिया, परंतु तुम्हारा देहाध्यास नहीं छूटा । अब देखिए, महात्माजी तो स्वयं अपना देहाध्यास दूर नहीं कर सके और विषय- लोलुप होकर पर-स्त्री की जाँघों पर हाथ फेरने लगे, परंतु दूसरे का देहाध्यास छुड़ाने को तैयार थे। ऐसे बद्धज्ञानियों के चित्त में कदापि शान्ति नहीं होती है, और दृष्टान्त को भी सुनिए—
पूर्व देश में एक पण्डित किसी मन्दिर में 'योगवाशिष्ठ' की कथा कहते थे । उनकी कथा में माई लोग भी बहुत आती थीं और गन्धर्व जाति की एक वेश्या भी उनकी कथा में आती थी और माई लोगों में बैठती थी ।
एक दिन कथा में स्त्री के संग का बहुत निषेध आया और पर-स्त्री के संग का बहुत ही दोष निकला । उस दिन कथा कहते-कहते जब पण्डितजी की दृष्टि उस वेश्या के ऊपर पड़ी, तब पण्डितजी का मन उस वेश्या में आसक्त हो गया । जब कथा समाप्त हुई, तब सब कोई अपने-अपने घर को चले गए, तो वह वेश्या भी अपने मकान को चली गई, और जाकर उसने विचार किया कि आज से फिर मैं इस व्यभिचार-कर्म को नहीं करूँगी । ऐसा निश्चय करके उसने अपना फाटक संध्या से ही बंद करा दिया और भीतर बैठकर भजन करने लगी । इधर तो यह हाल हुआ और
३२८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
उधर जब पण्डितजी कथा बाँचकर अपने घर गए, तब रात्रि आने का विचार करने लगे, इतने में रात्रि हो गई । जब एक पहर रात्रि व्यतीत हुई, तब पण्डितजी शिर पर कपड़ा डाले हुए उस वेश्या के मकान के नीचे पहुँचे और जाकर किवाड़ को हिलाया । तब नौकर ने वेश्या से कहा कि पण्डितजी आए हैं । वेश्या ने तुरंत किवाड़ खोल दिया। पण्डितजी ऊपर गए, तो वेश्या ने उनको पलँग पर बैठाया और आप नीचे बैठी, तब पण्डितजी ने कहा कि हे प्यारी ! तू मेरे पास बैठ, हम तो आज तुम्हारे साथ आनन्द करने आए हैं । वेश्या ने कहा कि महाराज ! आपने ही तो आज कथा में विषय-भोग की बड़ी निन्दा सुनाई और फिर आप ही ने यह भी कहा था कि जो पुरुष पर-स्त्री के साथ भोग करता है, उसको यमदूत अग्नि से तपे हुए खम्भों के साथ बाँधते हैं और स्त्री को भी अग्नि से तपे हुए खम्भों के साथ लगाते हैं । तब फिर मैं कैसे आपके साथ क्रीड़ा करूँ । तब पण्डितजी ने कहा कि जब कृष्णजी ने अवतार लिया था, तब उन्होंने उन सब खम्भों को उखाड़कर समुद्र में डाल दिया था । अब वे खम्भे नहीं रह गये हैं वे तो पूर्व युगों की वार्त्ताएँ थीं, इस युग की नहीं हैं, तू अपने को अकर्त्ता मानकर, आकर आनन्द ले । ऐसे बद्धज्ञानियों के चित्त कभी भी शान्ति को प्राप्त नहीं होते हैं । धर्मशास्त्र में भी कहा है—
पठकाः पाठकाश्चैव ये चाऽन्ये शास्त्रचिन्तकाः । सर्वे ते व्यसिनो मूर्खा यः क्रियावान् स पण्डिता ॥ १ ॥
अठारहवां प्रकरण । ३२९
जितने शास्त्र के पढ़ने वाले हैं, और जितने शास्त्र के पढ़ाने वाले हैं, और जो केवल शास्त्र का विचार ही करते हैं, वे सब व्यसनी और मूर्ख हैं । जो उनमें वैराग्यादि साधन सम्पत्ति करके युक्त हैं, वे ही पण्डित हैं । दूसरे शास्त्र-दृष्टि से पण्डित नहीं हैं । पूर्वोक्त युक्तियों से यह सिद्ध हुआ कि जो अध्यासी पुरुष हैं, वही बद्धज्ञानी हैं । केवल अकर्त्ता, अभोक्ता कहने से वह अकर्त्ता, अभोक्ता कदापि नहीं हो सकता है ॥ ५१ ॥
मूलम् ।
उच्छृङ्खलाप्याकृतिका स्थितिर्धीरस्य राजते ।
न तु संस्पृहचित्तस्य शान्तिमूढस्य कृत्रिमा ॥ ५२ ॥
पदच्छेदः ।
उच्छृङ्खला, अपि, आकृतिका, स्थितिः, धीरस्य, राजते, न, तु, संस्पृहचित्तस्य, शान्तिः, मूढस्य, कृत्रिमा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| धीरस्य= | ज्ञानी की | स्थितिः= | स्थिति |
| उच्छृङ्खला= | शान्ति-रहित | अपि= | भी |
| आकृतिका= | स्वाभाविक | राजते= | शोभती है |
३३० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| तु=परन्तु | कृत्रिमा=बनावटवाली |
| संस्पृहचित्तस्य=$\Big{ इच्छा-सहित चित्तवाले | शान्तिः=शान्ति |
| मूढ़स्य=अज्ञानी की | न राजते=नहीं शोभती है ॥ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो पुरुष निःस्पृह है, उसकी भी स्वाभाविक स्थिति शोभा करके युक्त ही होती है । क्योंकि उसमें कोई बनावट नहीं होती है । और जो मूढ़ इच्छा करके व्याकुल है, उसकी बनावट की शान्ति भी शोभायमान नहीं होती है ॥ ५२ ॥
मूलम् ।
विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान् ।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः ॥ ५३ ॥
पदच्छेदः ।
विलसन्ति, महाभोगैः, विशन्ति, गिरिगह्वरान्, निरस्तकल्पनाः, धीराः, अबद्धाः, मुक्तबुद्धयः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निरस्तकल्पना | =कल्पना-रहित | विलसन्ति | =क्रीड़ा करते हैं |
| अबद्धाः | =बन्धन-रहित | + च | =और |
| मुक्तबुद्धयः | =मुक्त बुद्धिवाले | +कदाचित् | =कभी |
| धीराः | =ज्ञानी | गिरिगह्वरान् | =$\Big{ पहाड़ की कन्दराओं में |
| \textbf{+ कदाचित् \textbf{+प्रारब्धवशात् | =$\Big{ कभी प्रारब्ध- वश से | विशन्ति | =प्रवेश करते हैं ॥ |
| महाभोगैः | =$\Big{ बड़े-बड़े भोगों के साथ |
अठारहवाँ प्रकरण । ३३१
भावार्थ । जिस ज्ञानी धीर के चित्त की सब कल्पनाएँ नष्ट हो गई हैं, वह प्रारब्ध के वश कभी भोगों विषे क्रीड़ा करता है, कभी प्रारब्धवश पर्वत और वनों में फिरा करता है, पर उसका चित्त सदा शान्त रहता है । क्योंकि वह आसक्ति कर्त्तृत्वाऽध्यास से रहित बुद्धिवाला है ॥ ५३ ॥
मूलम् । श्रोत्रियं देवतां तीर्थमंगनां भूपतिं प्रियम् । दृष्ट्वा संपूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना ॥ ५४ ॥
पदच्छेदः । श्रोत्रियम्, देवताम्, तीर्थम्, अंगनाम्, भूपतिम्, प्रियम्, दृष्ट्वा, संपूज्य, धीरस्य, न, का, अपि, हृदि, वासना ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| श्रोत्रियम्=पण्डित को | प्रियम्=पुत्रादि को |
| देवताम्=देवता को | दृष्ट्वा=देख करके |
| तीर्थम्=तीर्थ को | धीरस्य=ज्ञानी के |
| संपूज्य=पूजन करके | हृदि=हृदय में |
| + च=और | का अपि=कोई भी |
| अंगनाम्=स्त्री को | वासना=वासना |
| भूपतिम्=राजा को | न भवति=नहीं होती है ॥ |
भावार्थ । हे शिष्य ! जो श्रोत्रिय ब्रह्मवेत्ता हैं, उन विषे इन्द्र,
३३२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
अग्नि आदिक देवताओं, गंगा आदिक तीर्थों के पूजा करने से कामना उत्पन्न नहीं होती है । क्योंकि वे निष्काम हैं और सुन्दर स्त्री-पुत्रादिकों के प्रति और राजा को देख करके भी उनके चित्त में कोई वासना खड़ी नहीं होती है । क्योंकि वे सर्वत्र समबुद्धि और समदर्शी हैं ॥ ५४ ॥
मूलम् । भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजैः । विहस्य धिक्कृतो योगी न यातिविकृतिं मनाक् ॥ ५५ ॥
पदच्छेदः । भृत्यैः, पुत्रैः, कलत्रैः, च, दौहित्रैः, च, अपि, गोत्रजैः, विहस्य, धिक्कृतः, योगी, न, याति, विकृतिम्, मनाक् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| भृत्यैः=किंकरों करके | धिक्कृतः=धिक्कार किया हुआ |
| पुत्रैः=पुत्रों करके | योगी=ज्ञानी |
| दौहित्रैः=नातियों करके | मनाक्=किंचित् भी |
| च=और | विकृतिम्=विकार को अर्थात् चित्त के क्षोभ को |
| गोत्रजैः=बान्धवों करके | |
| अपि=भी | |
| विहस्य=हँस करके | न याति=नहीं प्राप्त होता है ॥ |
भावार्थ । हे शिष्य ! जो ज्ञानी जीवन्मुक्त हैं, उनका चित्त भृत्यों करके याने नौकरों करके, पुत्रों करके, स्त्रियों करके, कन्याओं करके और स्वगोत्रियों करके अर्थात् सम्बन्धियों करके भी तिरस्कार किया हुआ क्षोभ को नहीं प्राप्त होता है । और
अठारहवाँ प्रकरण । ३३३
उन करके सत्कार किया हुआ न हर्ष को प्राप्त होता है। क्योंकि राग-द्वेष का हेतु जो मोह है, सो मोह उनमें नहीं है ॥ ५५ ॥
मूलम् । संतुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते । तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते ॥ ५६ ॥
पदच्छेदः । सन्तुष्टः, अपि, न, संतुष्टः, खिन्नः, अपि, न, च, खिद्यते, तस्य, आश्चर्यदशाम्, ताम्, ताम्, तादृशाः, एव, जानते ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| + ज्ञानी=ज्ञानी पुरुष | अपि=भी |
| + लोकदृष्ट्या=लोक-दृष्टि से | न खिद्यते= { नहीं दुःख को प्राप्त होता है |
| संतुष्टः=सन्तोषवान् हुआ | तस्य=उसकी |
| अपि=भी | ताम् ताम्=उस उस |
| न=नहीं | आश्चर्यदशाम्=आश्चर्य दशा को |
| संतुष्टः=संतुष्ट है | तादृशा एव=वैसे ही ज्ञानी |
| च=और | जानते=जानते हैं ॥ |
| खिन्नः=खेद को पाया हुआ |
भावार्थ । हे शिष्य ! लोक-दृष्टि करके खेद को प्राप्त हुआ भी वह खेद को नहीं प्राप्त होता है और लोक-दृष्टि करके हर्ष को प्राप्त हुआ वह हर्ष को नहीं प्राप्त होता है । ऐसे विद्वान् की आश्चर्यवत् लीला को विद्वान् ही जानता है, दूसरा नहीं ॥ ५६ ॥
३३४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मूलम् । कर्त्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः । शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः ॥ ५७ ॥
पदच्छेदः । कर्त्तव्यता, एव, संसारः, न, ताम्, पश्यन्ति, सूरयः, शून्याकाराः, निराकाराः, निर्विकाराः, निरामयाः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| कर्त्तव्यता=कर्त्तव्यता | निर्विकाराः=संकल्प-रहित |
| एव=ही | च=और |
| संसारः=संसार है | निरामयाः=दुःख-रहित |
| ताम्=उस कर्त्तव्यता को | सूरयः=ज्ञानी |
| शून्याकाराः=शून्याकार | न पश्यन्ति=नहीं देखते हैं ॥ |
| निराकाराः=आकार-रहित |
भावार्थ । हे शिष्य ! “ममेदं कर्त्तव्यम्” मेरे को यह कर्त्तव्य है, ऐसे निश्चय का नाम ही संसार है । इसी कारण जीवन्मुक्त ज्ञानी उस कर्त्तव्यता को नहीं देखता है, और न उसका संकल्प करता है । क्योंकि वह संकल्प-मात्र से रहित है, वह शून्याकार है, और निराकारादि संकल्पों से भी रहित है, और विकारों से भी रहित है, और जो आध्यात्मिकादि रोग हैं, उनसे भी रहित है ॥ ५७ ॥
मूलम् । अकुर्वन्नपि स क्षोभाद्व्यग्रः सर्वत्र मूढधीः । कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलो हि निराकुलः ॥ ५८ ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३३५
पदच्छेदः ।
अकुर्वन्, अपि, संक्षोभात्, व्यग्रः, सर्वत्र, मूढधीः, कुर्वन्, अपि, तु, कृत्यानि, कुशलः, हि, निराकुलः ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । मूढधीः = अज्ञानी | च = और अकुर्वन् = कर्मों को नहीं करता हुआ | कुशलः = ज्ञानी अपि = भी | च = और सर्वत्र = सब जगह | कृत्यानि = कर्मों को संक्षोभात् = संकल्प-विकल्प के कारण | कुर्वन् = करता हुआ व्यग्रः = व्याकुल | अपि = भी भवति = होता है | हि = निश्चय करके | निराकुलः = निश्चय चित्तवाला | भवति = होता है ॥
भावार्थ ।
हे शिष्य ! अज्ञानी शून्य मंदिरों में और वनादिक, पर्वतादिक एकांत स्थानों में कर्मों को अर्थात् शरीर इन्द्रियादि के व्यापारों को न करता हुआ भी संकल्पों से व्यग्र चित्तवाला ही होता है, और विद्वान् सर्वत्र शरीर इन्द्रियादिकों के व्यापारों को लोक-दृष्टि करके करता हुआ भी व्यग्र चित्तवाला नहीं होता है । क्योंकि वह निःसंकल्प है ॥ ५८॥
मूलम् ।
सुखमास्ते सुखं शेते सुखमायाति याति च । सुखं वक्ति सुखं भुङ्क्तेव्यवहारेऽपि शान्तधीः ॥ ५९ ॥
३३६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः । सुखम्, आस्ते, सुखम्, शेते, सुखम्, आयाति, याति, च सुखम्, वक्ति, सुखम्, भुंक्ते, व्यवहारे, अपि, शान्तधीः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| व्यवहारे= | व्यवहार में | च= | और |
| अपि= | भी | याति= | जाता है |
| शान्तधीः= | ज्ञानी | सुखम्= | सुख-पूर्वक |
| सुखम्= | सुख-पूर्वक | वक्ति= | बोलता है |
| आस्ते= | बैठता है | च= | और |
| सुखम्= | सुख-पूर्वक | सुखम्= | सुख-पूर्वक |
| आयाति= | आता है | भुङ्क्ते= | भोजन करता है ॥ |
भावार्थ । जीवन्मुक्त ज्ञानी व्यवहार आदिकों में भी आत्मसुख करके ही स्थित रहता है । बैठते-उठते, शयन करते, खाते-पीते संपूर्ण क्रियाओं को करते हुए भी विद्वान् शान्तचित्त-वाला रहता है ॥ ५९ ॥
मूलम् । स्वभावाद्यस्य नैवार्त्तिर्लोकवद्व्यवहारिणः । महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः सुशोभते ॥ ६० ॥
पदच्छेदः । स्वभावात्, यस्य, न, एव, आर्त्तिः, लोकवत्, व्यवहारिणः, महाह्रदः, इव, अक्षोभ्य, गतक्लेशः, सुशोभते ॥
अठारहवां प्रकरण । ३३७
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यस्य=जिस | न=नहीं | ||
| व्यवहारिण=व्यवहार करनेवाले | एव=निश्चय करके | ||
| ज्ञानिन्=ज्ञानी को | सः=वह | ||
| गतक्लेश=क्लेश-रहित ज्ञानी | |||
| स्वभावात्={ | आत्मज्ञान के | महाह्रद इव=समुद्रवत् | |
| स्वभाव से | अक्षोभ्य=क्षोभ-रहित | ||
| लोकवत्=लोक की तरह | सुशोभते=शोभायमान होता है ॥ |
भावार्थ ।
ज्ञानवान् व्यवहार को करता हुआ भी अज्ञानी पुरुषों की तरह खेद को नहीं प्राप्त होता है। वह महाह्रद की तरह क्षोभ से रहित शोभा को प्राप्त होता है ॥ ६० ॥
मूलम् ।
निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते ।
प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलदायिनी ॥ ६१ ॥
पदच्छेदः ।
निवृत्तिः, अपि, मूढस्य, प्रवृत्तिः, उपजायते, प्रवृत्तिः, अपि, धीरस्य, निवृत्तिफलदायिनी ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मूढस्य=मूढ़ की | च=और | ||
| निवृत्तिः=निवृत्ति | धीरस्य=ज्ञानी की | ||
| अपि=भी | प्रवृत्तिः=प्रवृत्ति | ||
| प्रवृत्तिः=प्रवृत्ति-रूप | अपि=भी | ||
| उपजायते=होती है | निवृत्तिफल-दायिनी={ | निवृत्त के फल को देनेवाली है ॥ |
३३८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
मूढ़ पुरुष के इन्द्रियों के व्यापारों की निवृत्ति तो लोक-दृष्टि करके अवश्य प्रतीत होती है, परन्तु वह निवृत्ति प्रवृत्ति ही है । क्योंकि उसके अहंकारादिक निवृत्ति नहीं हुए हैं और ज्ञानवान् की लोक-दृष्टि करके इन्द्रियों की प्रवृत्ति प्रतीत भी होती है, तो भी वह निवृत्ति रूप ही है, और मुक्ति-रूपी फल को देनेवाली है । क्योंकि उसमें अभिमान का अभाव है ॥ ६१ ॥
मूलम् ।
परिग्रहेषु वैराग्यं प्रायो मूढस्य दृश्यते । देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागता ॥ ६२ ॥
पदच्छेदः ।
परिग्रहेषु, वैराग्यम्, प्रायः, मूढस्य, दृश्यते, देहे, विगलिताशस्य, क्व, रागः, क्व, विरागता ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । मूढस्य=ज्ञानी का | विगलिताशस्य= { गलित होगई है वैराग्यम्=वैराग्य | { आशा जिसकी प्रायः=विशेष करके | { ऐसे ज्ञानी को परिग्रहेषु=गृह आदि में | क्व=कहाँ दृश्यते=देखा जाता है | रागः=राग है परन्तु=परन्तु | च=और देहे=देह में | क्व=कहाँ | विरागता=वैराग्य है ॥
अठारहवाँ प्रकरण । ३३९
भावार्थ ।
हे शिष्य ! देहाभिमानी मूढ़ पुरुष को देह के साथ सम्बन्धवाले जो धन, वेश्या आदिक हैं, उनमें यदि किसी निमित्त से वैराग्य भी उत्पन्न हो जावे, तो भी वह वैराग्य शून्य है, परन्तु जिसका देहादिकों के साथ अभिमान नष्ट हो गया है, उसको देहसम्बन्धी पुत्रादिकों में न राग है, और शत्रु-व्याघ्रादिकों में न विराग है, राग और विराग उसको होता है, जिसको अपने देह का अभिमान है ॥ ६२ ॥
मूलम् ।
भावनाभावनासक्ता दृष्टिर्मूढस्य सर्वदा । भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी ॥ ६३ ॥
पदच्छेदः ।
भावनाभावनासक्ता, दृष्टिः, मूढस्य, सर्वदा, भाव्य-भावनया, सा, तु, स्वस्थस्य, अदृष्टिरूपिणी ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मूढस्य= | अज्ञानी की | सा= | दृष्टि |
| दृष्टिः= | दृष्टि | भाव्यभावनया= | दृष्टि की चिन्ता से युक्त हो करके |
| सर्वदा= | सर्वदा | ||
| भावनाभावना-सक्ता= | भावना में या अभावना में लगी हुई है | अपि= | भी |
| अदृष्टिरूपिणी= | दृश्य के दर्शन से रहित रूप- वाली | ||
| तु= | परन्तु | ||
| स्वस्थस्य= | ज्ञानी की | भवति= | होती है ॥ |
३४० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
हे शिष्य ! मूढ़ पुरुष कहता है कि मैं भावना करता हूँ, मैं अभावना करता हूँ । इस प्रकार सर्वदा भावना-अभावना में ही आसक्त रहता है । क्योंकि उसको भावना-अभावना में अहंकार है । और जो अपने स्वरूप में निष्ठा-वाला है, उसकी दृष्टि भावना-अभावना से रहित होकर सर्वदा अपने आत्मा में ही रहती है ॥ ६३ ॥
मूलम् ।
सर्वारम्भेषु निष्कामो यश्चरेद्बालवन्मुनिः ।
न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि ॥ ६४ ॥
पदच्छेदः ।
सर्वारम्भेषु, निष्कामः, यः, चरेत्, बालवत्, मुनिः, न, लेपः, तस्य, शुद्धस्य, क्रियमाणे, अपि, कर्मणि ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यः= | जो | चरेत्= | करता है |
| मुनिः= | ज्ञानी | तस्य= | उस |
| बालवत्= | बालकों की तरह | शुद्धस्य= | शुद्ध-स्वरूप को |
| निष्कामः= | कामना-रहित होकर | $\left.\begin{matrix} \textbf{क्रियमाणे} \ \textbf{कर्मण्यपि} \end{matrix}\right}=$ | $\left{\begin{matrix} किये हुए कर्म में \ भी \end{matrix}\right.$ |
| सर्वारम्भेषु= | $\left{\begin{matrix} सब क्रियाओं में \ आरम्भ \end{matrix}\right.$ | लेपः न भवति= | लेप नहीं होता है ॥ |
भावार्थ ।
जो विद्वान् बालक की तरह कामना से रहित होकर पहले जन्म के कर्मों के वश से अर्थात् प्रारब्ध-वश से सम्पूर्ण