अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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अठारहवां प्रकरण । ३३७
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यस्य=जिस | न=नहीं | ||
| व्यवहारिण=व्यवहार करनेवाले | एव=निश्चय करके | ||
| ज्ञानिन्=ज्ञानी को | सः=वह | ||
| गतक्लेश=क्लेश-रहित ज्ञानी | |||
| स्वभावात्={ | आत्मज्ञान के | महाह्रद इव=समुद्रवत् | |
| स्वभाव से | अक्षोभ्य=क्षोभ-रहित | ||
| लोकवत्=लोक की तरह | सुशोभते=शोभायमान होता है ॥ |
भावार्थ ।
ज्ञानवान् व्यवहार को करता हुआ भी अज्ञानी पुरुषों की तरह खेद को नहीं प्राप्त होता है। वह महाह्रद की तरह क्षोभ से रहित शोभा को प्राप्त होता है ॥ ६० ॥
मूलम् ।
निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते ।
प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलदायिनी ॥ ६१ ॥
पदच्छेदः ।
निवृत्तिः, अपि, मूढस्य, प्रवृत्तिः, उपजायते, प्रवृत्तिः, अपि, धीरस्य, निवृत्तिफलदायिनी ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मूढस्य=मूढ़ की | च=और | ||
| निवृत्तिः=निवृत्ति | धीरस्य=ज्ञानी की | ||
| अपि=भी | प्रवृत्तिः=प्रवृत्ति | ||
| प्रवृत्तिः=प्रवृत्ति-रूप | अपि=भी | ||
| उपजायते=होती है | निवृत्तिफल-दायिनी={ | निवृत्त के फल को देनेवाली है ॥ |