भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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३३८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

मूढ़ पुरुष के इन्द्रियों के व्यापारों की निवृत्ति तो लोक-दृष्टि करके अवश्य प्रतीत होती है, परन्तु वह निवृत्ति प्रवृत्ति ही है । क्योंकि उसके अहंकारादिक निवृत्ति नहीं हुए हैं और ज्ञानवान् की लोक-दृष्टि करके इन्द्रियों की प्रवृत्ति प्रतीत भी होती है, तो भी वह निवृत्ति रूप ही है, और मुक्ति-रूपी फल को देनेवाली है । क्योंकि उसमें अभिमान का अभाव है ॥ ६१ ॥

मूलम् ।

परिग्रहेषु वैराग्यं प्रायो मूढस्य दृश्यते । देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागता ॥ ६२ ॥

पदच्छेदः ।

परिग्रहेषु, वैराग्यम्, प्रायः, मूढस्य, दृश्यते, देहे, विगलिताशस्य, क्व, रागः, क्व, विरागता ॥

अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । मूढस्य=ज्ञानी का | विगलिताशस्य= { गलित होगई है वैराग्यम्=वैराग्य | { आशा जिसकी प्रायः=विशेष करके | { ऐसे ज्ञानी को परिग्रहेषु=गृह आदि में | क्व=कहाँ दृश्यते=देखा जाता है | रागः=राग है परन्तु=परन्तु | च=और देहे=देह में | क्व=कहाँ | विरागता=वैराग्य है ॥