भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 343, कुल 405 में से

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पृष्ठ 343

३३६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः । सुखम्, आस्ते, सुखम्, शेते, सुखम्, आयाति, याति, च सुखम्, वक्ति, सुखम्, भुंक्ते, व्यवहारे, अपि, शान्तधीः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
व्यवहारे=व्यवहार मेंच=और
अपि=भीयाति=जाता है
शान्तधीः=ज्ञानीसुखम्=सुख-पूर्वक
सुखम्=सुख-पूर्वकवक्ति=बोलता है
आस्ते=बैठता हैच=और
सुखम्=सुख-पूर्वकसुखम्=सुख-पूर्वक
आयाति=आता हैभुङ्क्ते=भोजन करता है ॥

भावार्थ । जीवन्मुक्त ज्ञानी व्यवहार आदिकों में भी आत्मसुख करके ही स्थित रहता है । बैठते-उठते, शयन करते, खाते-पीते संपूर्ण क्रियाओं को करते हुए भी विद्वान् शान्तचित्त-वाला रहता है ॥ ५९ ॥

मूलम् । स्वभावाद्यस्य नैवार्त्तिर्लोकवद्व्यवहारिणः । महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः सुशोभते ॥ ६० ॥

पदच्छेदः । स्वभावात्, यस्य, न, एव, आर्त्तिः, लोकवत्, व्यवहारिणः, महाह्रदः, इव, अक्षोभ्य, गतक्लेशः, सुशोभते ॥

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