अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 342, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ प्रकरण । ३३५
पदच्छेदः ।
अकुर्वन्, अपि, संक्षोभात्, व्यग्रः, सर्वत्र, मूढधीः, कुर्वन्, अपि, तु, कृत्यानि, कुशलः, हि, निराकुलः ॥
अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । मूढधीः = अज्ञानी | च = और अकुर्वन् = कर्मों को नहीं करता हुआ | कुशलः = ज्ञानी अपि = भी | च = और सर्वत्र = सब जगह | कृत्यानि = कर्मों को संक्षोभात् = संकल्प-विकल्प के कारण | कुर्वन् = करता हुआ व्यग्रः = व्याकुल | अपि = भी भवति = होता है | हि = निश्चय करके | निराकुलः = निश्चय चित्तवाला | भवति = होता है ॥
भावार्थ ।
हे शिष्य ! अज्ञानी शून्य मंदिरों में और वनादिक, पर्वतादिक एकांत स्थानों में कर्मों को अर्थात् शरीर इन्द्रियादि के व्यापारों को न करता हुआ भी संकल्पों से व्यग्र चित्तवाला ही होता है, और विद्वान् सर्वत्र शरीर इन्द्रियादिकों के व्यापारों को लोक-दृष्टि करके करता हुआ भी व्यग्र चित्तवाला नहीं होता है । क्योंकि वह निःसंकल्प है ॥ ५८॥
मूलम् ।
सुखमास्ते सुखं शेते सुखमायाति याति च । सुखं वक्ति सुखं भुङ्क्तेव्यवहारेऽपि शान्तधीः ॥ ५९ ॥