भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 347

३४० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

हे शिष्य ! मूढ़ पुरुष कहता है कि मैं भावना करता हूँ, मैं अभावना करता हूँ । इस प्रकार सर्वदा भावना-अभावना में ही आसक्त रहता है । क्योंकि उसको भावना-अभावना में अहंकार है । और जो अपने स्वरूप में निष्ठा-वाला है, उसकी दृष्टि भावना-अभावना से रहित होकर सर्वदा अपने आत्मा में ही रहती है ॥ ६३ ॥

मूलम् ।

सर्वारम्भेषु निष्कामो यश्चरेद्बालवन्मुनिः ।
न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि ॥ ६४ ॥

पदच्छेदः ।

सर्वारम्भेषु, निष्कामः, यः, चरेत्, बालवत्, मुनिः, न, लेपः, तस्य, शुद्धस्य, क्रियमाणे, अपि, कर्मणि ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यः=जोचरेत्=करता है
मुनिः=ज्ञानीतस्य=उस
बालवत्=बालकों की तरहशुद्धस्य=शुद्ध-स्वरूप को
निष्कामः=कामना-रहित होकर$\left.\begin{matrix} \textbf{क्रियमाणे} \ \textbf{कर्मण्यपि} \end{matrix}\right}=$$\left{\begin{matrix} किये हुए कर्म में \ भी \end{matrix}\right.$
सर्वारम्भेषु=$\left{\begin{matrix} सब क्रियाओं में \ आरम्भ \end{matrix}\right.$लेपः न भवति=लेप नहीं होता है ॥

भावार्थ ।

जो विद्वान् बालक की तरह कामना से रहित होकर पहले जन्म के कर्मों के वश से अर्थात् प्रारब्ध-वश से सम्पूर्ण